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Saturday, June 7, 2025

भारत में बैंकों का राष्ट्रीयकरण कब हुआ था?, बैंक प्रबंधन समिति क्या है?, प्राचीन काल तथा मध्‍यकाल में बैंकिंग व्‍यवसाय पर संक्ष्प्ति वर्णन

June 07, 2025





बैंकिंग क्या है और इसका इतिहास क्या है?

प्राचीन काल तथा मध्‍यकाल में बैंकिंग व्‍यवसाय पर संक्ष्प्ति वर्णन praacheen kaal tatha madhyakaal mein bainking vyavasaay par sankshpti varnan


भारत में प्राचीन काल से ही किसी न किसी रूप में रूपयों का लेन देन होता था बौद्ध काल से ही कुछ ऐसी संस्‍थांए थी जो की व्‍यापारियों और विदेशों में जाने या घूमने के लिए उधार देते थे। प्राचीनकाल में कागज के नोट बिल या चेक आदि का प्रयोंग नही किया जाता था। बल्कि 12 वी शताब्‍दी से गाव में साहूकारों तथा बडे सेठों से रूपया को उधार लेने लगें। ये जो सेठ महाजन होते थे वह राजा महाराजाओं तथा मुगलो को भी आर्थि सहायता दिया करते थे। इन लोगों को जगत सेठ के नाम से जाने जाते थे। 

प्राचीन भारतीय बैंकिंग व्यवस्था

        भारत में सबसे पहले बैंक की स्‍थापना  सन 1881 में की गई थी जिसका नाम  अवध कॉमर्शियल बैंक था। उसके बाद फिर पंजाब नेशनल बैंक की स्‍थापना सन 1894 हुई थी। सन 1906 में स्‍वदेशी आंदोलन शुरू होने के कारण वाणिज्‍यक बैंकों की स्‍थापना को प्रोत्‍साहन मिला। वर्ष 1913 से 1917 के दौरान विभिन्न राज्यों में बैंकों का दिवालिया हो जाने से  बैंकों का नियमन और उन पर नियंत्रण की आवश्यकता को बल मिल गया। इस कारण अधिनियम बैंकिंग कंपनी अधिनियमन सन 1949 में पारित किया गया और इसके बाद बैंकिंग कंपनी नियमन अधिनियम 1949 के रूप में जाना जाने लगा। इस नियम के जरिए बैंकिंग व्यवस्था पर कानूनी नियमन अधिकार रिजर्व बैंक को मिल गया।
सन 1955 में देश के सबसे बड़े बैंक इंपीरियल बैंक ऑफ इंडिया का राष्ट्रीयकरण किया गया इसका नाम बदलकर स्टेट बैंक ऑफ इंडिया कर दिया गया था और बाद में सन 1959 में किसके साथ सहयोगी बैंकों का गठन किया गया।


भारत में बैंकों का राष्ट्रीयकरण कब हुआ था? bhaarat mein bainkon ka raashtreeyakaran kab hua tha?, 


समाज के दायित्व को देखते हुए केंद्र सरकार ने आर्थिक विकास की मुख्यधारा लाने के उद्देश्य 14 प्रमुख बैंकों का नियंत्रण अपने हाथ में लेने लगा।  14 जुलाई 1969 को यह आदेश जारी किया। 15 अप्रैल सन 1980 को अन्य बैंकों का भी राष्ट्रीयकरण कर दिया गया।

बैंक प्रबंधन समिति क्या है? baink prabandhan samiti kya hai?, 

आठवें दशक के अंत में कुछ ऐसी अनियमित व्यवस्था पाई गई जो सरकार को लगा कि इन्हें दूर किया जाना चाहिए ताकि वित्तीय व्यवस्था  और अर्थव्यवस्था को बनाने में  भूमिका निभा सके। तदनुसार वित्तीय ढांचे संगठन कामकाज और ऐसी सभी प्रक्रिया की जांच के लिए 14 अगस्त सन 1991 को श्री एम नरसिंहम की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया गया। यह समिति सिफारिशों के आधार पर सन 1993 में बैंकों में हो रहे गड़बड़ी को सुधार के लिए बनाई गई थी।




भुगतान संतुलन अर्थ , परिभाषा, प्रकार, कारण, उपाय

June 07, 2025

 


भुगतान संतुलन अर्थ क्‍या है| bhugtan santulan ka arth 

भुगतान संतुलन की परिभाषा| bhugtan santulan ki paribhasha

भुगतान संतुलन कितने प्रकार| bhugtan santulan ke prakar

भुगतान संतुलन के प्रतिकूल होने के क्या कारण| bhugtan santulan ke karn

भुगतान संतुलन में असंतुलन को दूर करने के उपाय| bhugtan santulan ke upay


भुगतान संतुलन क्या होता है? bhugtan santulan kya hai

भुगतान संतुलन से अभिप्राय है कि देश के समस्त आया तो एवं निर्यात ओ के साथ अन्य सेवाओं के मूल्यों के संपूर्ण विवरण से है जो एक निश्चित समय के लिए बनाया जाता है भुगतान संतुलन में देश की विदेशी मुद्रा की लेन और देन का ब्यावरा शामिल किया जाता है।


भुगतान संतुलन की परिभाषा/ bhugtan santulan ko paribhashit kijiye

प्रोफेसर हेबरलर के अनुसार

भुगतान संतुलन का अर्थ किसी भी हुई समय में विदेशी मुद्रा की खरीदी एवं बेची गई मात्रा से है।


प्रोफेसर बेनहम के अनुसार

किसी देश का भुगतान संतुलन उसका शेष विश्व के साथ एक समय में दी जाने वाली मौद्रिक लेनदेन का विवरण होता है जबकि एक देश का व्यापार संतुलन एक निश्चित समय में इसके आयात एवं निर्यात के बीच संबंधों को दर्शाता है।


भुगतान संतुलन में अतिरिक्त क्या है?

भुगतान संतुलन में घाटा क्या है?

सामान्यतः भुगतान संतुलन बराबर रहता है किंतु जब चालू खाते की बाकी व पूंजीगत सौदे की शुद्ध राशियों की बाकी को जोड़कर जो राशि आती है वह भुगतान संतुलन के बचत तथा घाटे को दर्शाती है जब कोई प्राप्तियां कम एवं कुल भुगतान अधिक होता है तो भुगतान संतुलन में घाटा होता है और इसके उल्टा यदि प्राप्तियां अधिक होती हैं तो और भुगतान कम करना पड़ता है तो बचत या अतिरेक कहते हैं।

भुगतान संतुलन कितने प्रकार के होते हैं?/ bhugtan santulan ke prakar kya hai

1. चालू खाता

2. पूंजी खाता

3. एकतरफा हस्तांतरण खाते

4. आधिकारिक आरक्षित खाते




भुगतान संतुलन के प्रतिकूल होने के क्या कारण है?/  bhugtan santulan ke karan

1. खाद्यान्नों का  आयात 

देश के अंदर किसी प्रकार का प्राकृतिक प्रकोप आ जाने से खाद्यान्नों का बड़े पैमाने में आयात करना पड़ता है जो कि देश के भुगतान संतुलन की प्रतिकूलता का प्रमुख कारण है।

2. भारी मशीनों का आयात

औद्योगिकीकरण को बढ़ाने के लिए बड़ी मशीनों का आयात किया जाता है तकनीकी ज्ञान का भी आयात किया जाता है।

3. स्पीति प्रभाव

विभिन्न योजनाओं में सरकार द्वारा बड़ी मात्रा में धनराशी का खर्च किया जाता है जिससे मुद्रास्फीति में लगातार बढ़ोतरी हुई है इस  प्रभाव के कारण विदेशियों को भारत का बाजार बहुत अच्छा मिला जिस से आयात बड़ा और भुगतान संतुलन प्रतिकूल हो गया।


4. निम्न निर्यात

भारत देश के अंदर आयातो से उसके निर्यातो की तुलना नहीं की जा सकती है। अपने देश के अन्‍दर ऐसी वस्‍तुओ का निर्माण किया जाता है जिनकी लागत  अधिक होती है और उस तरह से वस्‍तुओ का निर्माण अच्‍छी गुणवत्‍ता वाली नही हो पाती है या कह सकते है की खराब होती है । जिससे विश्‍व बाजार में उनकी मॉग कम होती है । 

5. सुरक्षा पर खर्च 

भारत में चीन एवं पाकिस्‍तान से युुद्ध के भय के कारण देश में भारी सुरक्षा के लिए अधिक धन खर्च की जाती है । और सुरक्षा से संबंधिक तकनीकी मशीनों का आयात किया जाता है । 

6. जनसंख्‍या 

भारत में जनसंख्‍या दिन प्रतिदिन बढ्ती जा रही है जिससे आयातों मे वृृद्धि होती जाती है । तथा घरेलू अपभाेग बढ्ने के कारण निर्यात की क्षमता में कमी आयी है। 

भुगतान संतुलन में असंतुलन को दूर करने के उपाय / bhugtan santulan ke upay

1. निर्यातों को प्रोत्‍साहन - भारत सरकार को निर्यात को बढ्ने के लिए हर संभव को प्रयास कारने चाहिए। 
    ।.1 निर्यात करों में कमी की  जाना चाहिए 
    ।.2 देया में उद्योगों को आर्थिक सहायता दी जानी चाहिए 
    ।.3 विदेशों में वस्‍तुओं के लिए प्रचार व विज्ञापन किया जाना चाहि‍ए 
2. आयात में कमी -देश में अपने आयातों में कमी करना चाहिए जिससे देश में आने वाली वस्‍तुओंंको महगी कर देनी चाहिए जिससे उसकी मॉग कम हो। 
    1. आयात करों में वृद्धि करनी चाहिए 
    2. साथ में लाइसेंस व कोटा प्रणाली का भरपूर्ण सहायता देनी चाहिए 
3. आयात - प्रतिस्‍थापन -
    जिन देशों में आयात किया जाता है उनके लिए प्रतिस्‍थापन की व्‍यवस्‍था की जानी चाहिए । इसके लिए घरेलू उत्‍पादन बढ़ा़या जाना चाहिए ।
4. विदेशी ऋण 
    भुगतान असंन्‍तुलन की समस्‍या को दूर करने के लिए विदेशी ऋणों का प्रयोग करना चाहिए 
5. विनिमय नियंत्रण
 भुगतान  संतुलन को ठीक करने के लिए विनिमय नियंत्रण भी एक रास्‍ता है । इससे आयात घटते है निर्यात बढ़ते है ।  

मांंग का अर्थ , परिभाषा, तत्‍व, व‍िशेषताऍं ,व्‍याख्‍या , मान्‍यताऍं , अपवाद

June 07, 2025

 


 मॉंंग से आप क्‍या समझते है, 

मॉंग को प्रभावित करने वाले तत्‍व लिखिए, 

मॉंग की परिभाषा,  मॉंग के नियम लिखिए, 

माँँग के नियम की विशेेषता, मॉंग के नियम की मान्‍यता लिखिए, 

माँँग के नियम लागू होने के कारण बताइए, 

मॉंग के नियम के अपवाद लिखिए    

 mang ka niyam
mang ka arth likhiye
mang ka arth
mang ke niyam se kya abhipray hai
mang ki paribhasha
mang ki paribhasha in hindi
mang ke tatv
mang ke niyam
mang ke niyam ki visheshtayen bataiye
mang ke niyam ki vyakhya
mang ke niyam ke apvad
mang ke niyam ki manyata

मांग का अर्थ एवं परिभाषा / mang ka arth likhiye

माॅग से अभिप्राय है कि एक दी हुई वस्तु की उन विभिन्न मात्राओं से हैं जिन्हें उपभोक्ता एक बाजार में किसी दिए हुए समय में विभिन्न मूल्यों पर खरीद करते हैं वस्तु के लिए केवल इच्छा का होना ही वस्तु की मांग नहीं कहलाते बल्कि इच्छा की पूर्ति के लिए व्यक्तियों के पास साधन भी होने चाहिए तभी वह माग कहलाएगी। 

अर्थशास्त्र में मांग की परिभाषा क्या है?/ mang ki paribhasha

mang ki paribhasha in hindi

प्रोफ़ेसर मिल के अनुसार

मांग से हमारा आशय किसी वस्तु की उस मात्रा से होता है जो एक निश्चित मूल्य पर खरीदी जाती है इसका अर्थ मांग सदा मूल्य से संबंधित होता है।

प्रोफ़ेसर पेंशन के अनुसार

मॉग में निम्‍नलिखित तीन बाते  शा‍म‍िल होती है 

1 किसी वस्‍तु को प्राप्‍त करने की इच्‍छा

2. उसे क्रय करने के साधन और

3. इन साधनों से वस्‍तु प्राप्‍त करने की तत्‍परता।

प्राफेसर बेनहम के अनुसार

किसी दिये हुए मूल्‍य पर वस्‍तु की मॉग उस मात्रा को कहते है जो उस मूल्‍य पर एक निश्चित समय में क्रय की जाती है । 

मॉंंग को प्रभावित करने वाले तत्‍व लिखिए /mang ke tatv

1. वस्‍तु की कीमत - किसी वस्‍तु की मॉग को प्रभावित करने का महत्‍वपूर्ण तत्‍व उसकी कीमत होती है । अगर वस्‍तु की कीमत में परिवर्तन होने पर उसकी मॉग में भी परिवर्तन हो जाता है । अधिक्‍तर वस्‍तु की कीमत घटने पर वस्‍तु की मॉग बढ जाती है । ठीक इसी के उल्‍टा होता है अगर वस्‍तु की कीमत बढती है तो उसकी मॉंग घट जाती है ।

2. उपभोक्‍ता की आय - वस्‍तु की उपभोग करने वाले व्‍यक्ति की आय भी किसी वस्‍तु की मॉंग को निर्धारित करने वाला महत्‍वपूर्ण निर्धारक तत्‍व है । उदाहरण के लिए अगर किसी व्‍यक्ति की आय बढ जाने पर वह किसी वस्‍तु की अधिक मात्रा  में ऊचे मूल्‍य पर क्रय करेगा। अगर आय कम होने पर वस्‍तु को क्रय करने की मूल्‍य में कम मात्रा में क्रय करेगा।

3. धन की वितरण - यदि समाज में मूल्‍य का वितरण असमान है तो ऐसी वस्‍तुओं  की मॉग अधिक होगी जो पूजीपतियो द्वारा वस्‍तुओं को खरीदी की जाती है । यदि व्‍यक्तियों के आय समान है तो व्‍यक्तियों के आय में कम अन्‍तर आयेगा वस्‍तु की मॉंग बढेगी।

4. जनसंख्‍या में परिवर्तन - जनसंख्‍या बढने पर वस्‍तुओं की मूल्‍य अधिक होने पर भी वस्‍तु की मॉग बढती है । अगर कम जनसंख्‍या होगी तो वस्‍तुओ की मॉग कम होगी ।

5. ऋतु में परिवर्तन -ऋतु परिवर्त में भी मॉग का प्रभाव पडता है जैसे ठंडी के ऋतु में बर्फ का मूल्‍य कम हाे जाता है और उसकी कोई मॉग भी नही करता है  इसके विपरीत अगर गर्मी का ऋतु हो तो बर्फ का मूल्‍य बढ जाता है । 

अर्थशास्त्र में मांग का नियम क्या है?/ मांग के नियमों से क्या अभिप्राय है?/ mang ke niyam

मॉंग का नियम - किसी वस्‍तु का मूल्‍य तथा उस वस्‍तु की मागी गई मूल्‍य की मात्रा के परस्‍पर संबंध को माँँग का नियम कहा जाता है । माँँग का नियम यह सिद्ध करता है कि किसी वस्‍तु का मूल्‍य बढने पर   उसकी मॉंग में कमी तथा मूल्‍य घटने पर मॉग में बढने लगती है । 

मांग के नियम की विशेषताएं/ mang ke niyam ki visheshtayen bataiye

1. कीमत एवं मॉंग में विपरीत संबंध होते है 

2. कीमत स्‍वतंत्र होती है और मॉग आश्र‍ित होता है 

3. मॉंग का नियम एक गुणात्‍मक कथन है ।

4. मॉग का नियम किसी निश्चित समय पर वस्‍तु अथवा सेवा की कीमत और मॉंग में विपरीत संबंध को स्‍पष्‍ट करती है । 

 

मांग के नियम की व्याख्या कीजिए/ mang ke niyam ki vyakhya

 1) किसी वस्‍तु की उपभोग करते समय में व्‍यक्ति की आय में परिवर्तन नही होना चाहिए क्‍योंकि ऐसी स्थिति में उसके खर्च करने की शक्ति में परिवर्तन हो जाता है । 

2) यदि वस्‍तु के प्रतिस्‍थानापन्‍न सम्‍भव हो तो उस वस्‍तु के मूल्‍य में किसी भी तरह का परिवर्तन नहीं होना चाहिए  क्‍योंकि यह नियम ठीक प्रकार से लागू नहीं होता है ।    

3) उपभोग करने वाले व्‍यक्ति की वस्‍तु को प्राप्‍त करने की तीव्रता समान रहनी चाहिए । यदि इसमें किसी प्रकार का परिवर्तन होता है तो माग का नियम ठीक प्रकार से लागू नही होता है । 

4) उपभोग करते समय उपभोक्‍ता की इच्‍छा में कोई परिवर्तन नही होना चाहिए ।

5) वस्‍तु की पूर्ति करते समय वस्‍तु के आकार या गुण में कोई परिवर्तन नही होना चाहिए । 

मांग का नियम क्या है इसकी मान्यताओं और अपवादों की व्याख्या करें?/ mang ke niyam ki manyata

        1) सीमान्‍त उपयोगिता हास्‍य नियम - यह नियम यह बताता है कि जैसे- जैसे एक वस्‍तु की अधिक इकाइयों का उपयोग किया जाता है वैसे-वैसे उससे प्राप्‍त होने वाली सीमान्‍त उपयोगिता कम होती जाती है क्‍योंकि उपभोक्‍ता वस्‍तु के लिए सीमान्‍त उपयोगिता के बराबर मूल्‍य नही देने को तैयार रहता है यदि वस्‍तु की मूल्‍य में कमी हाती है तो उपभोक्‍ता वस्‍तु की अधिक इकाई का उपभोग करता है । अत- मॉग का नियम सीमान्‍त उपयोगिता के हास्‍य नियम पर आधारित है । 

2) प्रतिस्‍थानापन्‍न वस्‍तुओ का प्रभाव - जब किसी वस्‍तु की मूल्‍य बढती है तो इसकी स्‍थानापन्‍न वस्‍तु की सामने मूल्‍य स्‍वम् हि कम हो जाती है । जैसे कि वस्‍तु की कीमत वृद्धि होने पर इसकी स्‍थानापन्‍न वस्‍तु अपेक्षाकृत सस्‍ती हो जाती है ।  

 काॅफी की मूल्‍य में अधिक  होने पर  लोग चाय की अधिक मॉग करते है । 

3) आय प्रभाव - आय प्रभाव यह  बताता है कि किसी वस्‍तु के मूल्‍य में कमी होने से उभोक्‍ता की आय या क्रय-शक्ति में वृद्धि होती है। और वह मुद्रा की उतनी ही मात्रा में अधिक से अधिक वस्‍तु खरीद सकता है । 

4) क्रेताओं की संख्‍या में परिवर्तन - जब वस्‍तु की मूल्‍य कम हो जाती है तो कुछ उपभोक्‍ता भी इसकी वस्‍तु कुछ मात्रा खरीद लेते है । समाज में भिन्‍न भिन्‍न क्रय शक्ति वाले उपभोक्‍ता होते है ।  


माँग के नियम के दो अपवाद बताइए ।mang ke niyam ke apvad

1) भविष्‍य में किसी वस्‍तु के दुर्लभ होने की सम्‍भावना -  यदि किसी वस्‍तु के कीमत में वृद्धि के साथ - साथ भविष्‍य में उस वस्‍तु की मूल्‍य में बढने से लोग उस वस्‍तु को संग्रह करने लगते है । 

2) आवश्‍यक वस्‍तुओं के सम्‍बन्‍ध में यह नियम क्रियाशीलता नही होता - हम पहले कह चुके है कि मॉग का नियम हास्‍यसमान तुष्टिगुण नियम पर आधारित है। हास्‍य समान तुष्टिगुण नियम केवल सुखम अर्थव्‍यवस्‍था में ही लागू होता है ।    

3) प्रतिष्‍ठा प्रदान करने वाली अथवा मूल्‍यवान वस्‍तुओं पर मॉंग नियम लागू नहीं होता -  अपनी मान को बढाने के लिए लोग अथवा कीमती वस्‍तु का प्रयोग धनी लोग समाज में सम्‍मान पाने अथवा अपनी सम्‍पन्‍नता का प्रदर्शन करने को दिखाते है । अत- ऐसी वस्‍तुओं का  मॉग बढ जाने पर इस तरह की वस्‍तु का मूल्‍य और मॉंग अधिक बढ जाते है । 

4) उपभोक्‍ता की अज्ञानता - कभी - कभी उपभोक्‍ता अज्ञानता उचे मूल्‍य पर वस्‍तुआकें की अधिक मॉंग बढ जाती है ।। इनकी मॉंग घट जाने में इसकी मॉंग कम कर देते है। 

5) गिफिन का विरोधाभास - सर रॉबर्ट गिफिन ने बताया कि निम्‍नकोटि की वस्‍तुओं के संबंध में मॉग का नियम लागू होते है । 


    

            

मांग की लोच का अर्थ, परिभाषा, महत्त्व , कारक, तत्वों सहित व्‍याख्‍या

June 07, 2025




mang ki loch ke prakar

mang ki loch kya hai

mang ki loch ki vyakhya kijiye




मांग की लोच का अर्थ / mang ki loch ka mahatva

अर्थशास्‍त्र में वस्‍तु की कीमत में होने वाले परिवर्तन के परिणामस्‍वरूप उस वस्‍तु की मॉग में जिस मात्रा में या गति में परिवर्तन होता है । उसे ही मॉग की लोच कहते है । इस प्रकार मॉग में लोच मॉग एवं कीमत की संबंध को स्‍पष्‍ट करती है ।       

माँग की लोच की परिभाषा बताइए/ mang ki loch ki paribhasha

प्रोफेसर मार्शल के अनुसार -बाजार में मॉग की लोच का कम या अधिक होना इस बात पर निर्भर करता है कि एक निशिचत मात्रा में कीमत के घट जाने पर मॉंग की मात्रा अधिक वृृद्धि होती है । अगर वस्‍तु की कीमत बढ़ जाने पर वस्‍तु की मॉग में की होती है । 
   

प्रोफेसर केयरनक्रास के अनुसार - किसी वस्‍तु की मॉंग की लोच वह दर है जिस पर खरीदी जाने वाली मात्रा की कीमत परिवर्तनों के परिणामस्‍वरूप में बदलती है ।  

मांग की लोच के क्या महत्त्व है / mang ki loch ka mahatva

 1)मूल्‍य के निर्धारण करने में महत्‍व - मॉंग की लोच अधिक होने पर वस्‍तु की मूल्‍य को नीचे रखा जाता है अगर वस्‍तु की मूल्‍य को उचा रखने पर वस्‍तु की मॉग बढ जाती है और ठीक इसके उल्‍टा बेलोचदार वस्‍तुओ को मूल्‍य उचा रखा जाता है । जैसे पूर्ण प्रतियोगिता, एकाधिकार, एकाधिकृृत प्रतियोगिता आदि में वस्‍तु की मूल्‍य निर्धारण करने में सहायता प्रदान करती है / 

2) वितरण के सिद्धांत में महत्‍व - मॉंग की लोच का विचार उत्‍पादन के विभिन्‍न साधनों का पुरस्‍कार निर्धारित करने में सहायक होता है जैसे कि उत्‍पादन कर्ता उन साधनों को अधिक पुरस्‍कार देता है जो साधन अधिक बेलोच होते है  तथा उन साधनो  को कम पुरस्‍कार देता है जिनकी  मॉग उनके लिए लोचदार होती हैै।  

3) सरकार के महत्‍व - ऐसी वस्‍तुओ की मॉंग की लोच बेलोचदार होती है तो उन वस्‍तुओं पर कर की दर उची रखी जाती है क्‍योंकि उची दर लगाने पर भी वस्‍तु की मॉंग में कोई परिवर्तन नहीं होता है और उसी मॉग पूर्व तरीके से रहती है । ठीक इसके उल्‍टा कर दे जिन वस्‍तुओ की मॉंग की लोच अधिक लोचदार होती है उन वस्‍तुओं पर कर की दर कम रखी जाती है क्‍योंकि  ऐसी वस्‍तुओ की मॉंग में परिवर्तन होने लगता है । इसलिए कर निर्धारण में मॉंग की लोच की धारणा सरकार के लिए अत्‍यन्‍त महत्‍वपूर्ण होती है । 

अंतरराष्ट्रीय व्यापार में महत्व  - अंतरराष्ट्रीय व्यापार के अंतर्गत देश में व्यापार का लाभ उस देश की व्यापार की शर्तों को निर्धारित करता है और व्यापार के साथ दोनों देशों में आयात और निर्यात  की मांग एवं पूर्ति की लोच पर निर्भर करती है उदाहरण यदि किसी देश की निर्यात वस्तुओं की मां ब्लाउज दार है तो उस वस्तु की कीमतों को ऊंची दामों में बेच सकेगा इसी प्रकार आयात के वस्तुओं में यदि उस वस्तु की मांग रोजदार है तो उस वस्तु की कीमत ऊंची दर पर देना पड़ेगा।

यातायात में उद्योग में महत्व - यातायात उद्योग में भाड़े की दरें निर्धारित करने में मां किलोज में सहायक होता है जिन वस्तुओं की यातायात में माग बेलोचदार होती है तो ऐसे भाड़ों की दर ऊंची रखी जाती है तथा जिनकी मां लोचदार होती है उनकी दरें नीचे रखी जाती है।


मांग की लोच को प्रभावित करने वाले कारक लिखिए, माँग की लोच को प्रभावित करने वाले विभिन्न तत्वों की व्याख्या कीजिए,

mang ki loch ko prabhavit karne wale karkon ki vyakhya

mang ki loch ko prabhavit karne wale karak

1) वस्तु की प्रकृति - किसी वस्तु की माग की लोच बहुत कुछ उसकी प्रकृति पर निर्भर करती है कुछ ऐसी अनिवार्य वस्तु है जिनकी मांग की लोच बेलोचदार होती है क्योंकि उन वस्तु को क्रय करना उपभोक्ता के लिए अनिवार्य होता है विलासिता की वस्तुओं की मांग अत्यधिक लोचदार व आरामदायक वस्तुओं की मांग साधारण लोचदार होती है।

वस्तुओं के क्रेता का वर्ग - वस्तुओं की मांग क्रेता के वर्ग पर भी निर्भर रहती है यदि कोई ऐसी वस्तु है जिन का उपभोग केवल धनी व्यक्ति ही कर सकते हैं तो उन वस्तुओं की मांग लाेच बेलोच होगी तो वस्तुओं के मूल्य में परिवर्तन होने पर भी विशेष प्रभाव नहीं पड़ता है यदि किसी निम्न वर्ग का उपभोग करता है तो उन वस्तुओं की मांग की लोच अधिक लोचदार होगी तो कीमत में परिवर्तन होने पर उनकी माग में बहुत अधिक परिवर्तन हो जाता है।

स्थानापन्न वस्तुओं की मां लोचदार होती है - ऐसी वस्तुएं जिनकी मौत उनके स्थान पर अपेक्षाकृत सस्ती वस्तुओं का उपयोग किया जा सकता है तो अधिक लोचदार होती हैं। जैसे एक ही मूल्य पर बहुत सारे कपड़े धोने के साबुन मिल जाते हैं लेकिन किसी एक साबुन का मूल्य अधिक हो जाने पर उसके स्थान पर दूसरी साबुन का उपयोग करने लगते हैं जिससे पहले उपयोग करने वाले साबुन की मांग घट जाती है।

वस्तुओं का मूल्य - मांग कि लोच वस्तु के मूल्य पर निर्भर करती है ऐसी वस्तुएं जिनका मूल्य अधिक होता है उनकी माग कम लोचदार होती है और जिन वस्तुओं की कीमत कम होती है उन वस्तुओं की मांग कम लोचदार या बेलोचदार होते हैं। जिन वस्तुओं का मूल्य ना अधिक हो ना बहुत कम है उनकी मांग प्राय: लोचदार होती है।

समाज में धन के वितरण का स्वरूप - जब समाज में धन का वितरण सामान होता है तो सभी व्यक्तियों की खरीदने की शक्ति समान रहती है अतः मूल परिवर्तन होने पर भी वस्तु की मांग पर कोई परिवर्तन नहीं होता है ऐसी अवस्था में कुछ व्यक्ति अधिक खरीदते हैं और कुछ कम अतः मूल्य का परिवर्तन से कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।

मांग की आड़ी लोच का सूत्र, मांग की आड़ी लोच का विचार किसने दिया, मांग की आड़ी लोच किसे कहते हैं, मांग की कीमत लोच से आप क्‍या समझते है,

मांग की कीमत लोच से आप क्‍या समझते है, / mang ki kimat loch ka arth likhiye

मॉंग की कीमत लोच वस्‍तु की कीमत में परिर्वन के फलस्‍वरूप वस्‍तु की मॉग मात्रा में होने वाले परिवर्तन की अर्थात यह कीमत में थोडे परिवर्तन के प्रयुक्‍त माप  की मात्रा में होने वाले परिवर्तन का माप को प्रस्‍तुत करता है । 

मांग की आड़ी लोच किसे कहते हैं / mang ki aadi loch kise kahate hain

मांग की लोच को ऐसी स्थिति पर लागू किया जात है जहा पर दो वस्‍तुओं के कुछ गुण एक दूसरे से मिलते है या कि उन वस्‍तुओं के बीच संबंध हो या पूरक हो अथवा स्‍वतंत्र हो । तो उनकी मॉंग में प्रतिस्‍पर्द्धापूर्ण होता है । अगर ऐसी वस्‍तुओं किसी एक वस्‍तु की मूल्‍य में वृद्धि होती है तो दूसरे वस्‍तु की माँँग बढ जाती है तो उसे इस तरह की मॉग की आडी लोच कहते है ।  

मांग की आड़ी लोच का सूत्र

               ▲qx = X  वस्‍तु की मॉगी गयी मात्रा में आनुपातिक परिवर्तन 
                  ▲py = Y वस्‍तु के मूल्‍य में आनुपातिक परिवर्तन 
                    Q1x = X की प्रारम्भिक मॉग 
                    Q2x = X की दूसरी मॉंग 
                    P1y = Y  का प्रारम्भिक मूल्‍य
                    P2y = Y का बाद वाला मूल्‍य
                   qx = X  वस्‍त की प्रारम्भिक मूल्‍य
                    py = Y वस्‍तु की प्रारम्भिक मूल्‍य 
                  Ec =  मॉंग की आडी लोच


मांग की आय लोच क्या है मॉंग की आय लोच का सूत्र

मॉंग की आय लोच - आय की लोच का शाब्दिक अर्थ है कि आय में परिवर्तन होने पर वस्‍तु की माँँगमें क‍िस अनुपात में परिवर्तन होंगें । सरल शब्‍दों में आय तथा मॉंग के प्रतिशत परिवर्तनों के अनुपात को ही आय लोच कहते है ।
प्रो. वाटसन के अनुसार  अन्‍य निर्धारको के स्थिर  रहने पर  आय में परिवर्तन के कारण मॉग में परिवर्तन दर को माॅॅग की लोच कहते है । 

मॉंग की आय लोच का सूत्र

  


    Ei =  मॉंग की आय लोच 
Q =  मॉंग में परिवर्तन 
    Q =  आरम्भिक मॉग की मात्रा
    Y =  प्रारम्भिक आय
Y =  आय में परिवर्तन 


                    

  

पूर्ति का अर्थ , परिभाषा, नियम, प्रकार, कारक , अपवाद, मान्‍यताऍं आदि सभी की व्‍याख्या

June 07, 2025



purti ki paribhasha dijiye

purti ke prakar

purti ki paribhasha
purti ka niyam
purti ka arth kya hai
purti se kya aashay hai
purti hindi meaning
purti ke niyam ke apvad likhiye
purti kise kahate hain
purti ki paribhasha likhiye
purti in hindi
purti se aap kya samajhte hain
purti ka arth bataiye
purti ka kya arth hai
purti kya hai
पूर्ति क्या है
पूर्ति की परिभाषा दीजिए
पूर्ति की परिभाषा

purti ka arth

पूर्ति का क्या अर्थ है बताइए/ purti ka arth samjhaie

वस्‍तु की वह मात्रा जिसे उत्‍पादन कर्ता एवं उस उत्‍पादन वस्‍तु की विक्रेता दोनों के बीच एक निश्चित मूल्य पर बेचने के तत्‍यपर से है । दूसरे शब्‍दों में किसी वस्‍तु की पूर्ति से आशय उस मात्रा से से है जो किसी समय में कीमत विशेष की पर बाजार में वस्‍तु उपलब्‍ध होती है । 

पूर्ति की परिभाषा / purti ki paribhasha dijiye

प्रो. बेन्हम के अनुसार - पूर्ति का आशय वस्तु की उस निश्चित मात्रा से है जिसे प्रति इकाई के मूल्य पर किसी निश्चित अबधि में बेचने के लिए विक्रेता द्वारा प्रस्ततु किया जाता है। 

पूर्ति के नियम को समझाइये/ purti ka niyam kya hai

यदि किसी अवधि बिन्‍दू पर पर्ति की तकनीक दशाओं के अलावा अन्‍य बाते सामान्‍य रहे तो वस्‍तु विशेष की मूल्‍य में परिवर्तन होने पर उसकी पूर्ति में भी परिवर्तन होते है अत- कीमत और पूर्ति में प्रत्‍यक्ष रूप संबंध होते है । वस्‍तु की मूल्‍य में वृद्धि होने पर उस वस्‍तु की पूर्ति बढ जाती हे और उस वस्‍तु की मूल्‍य में कमी आने पर उस वस्‍तु की पूर्ति घट जाती है । वस्‍तु के प्रति जो मूल्‍य में  परिवर्तन के साथ -साथ उसकी ही दिशा में में वस्‍तुुकी पर्ति के घटने बढने की प्रवृत्ति को पूर्ति का नियम कहते है ।    

पूर्ति के प्रकारों को समझाइए, purti ke prakar

1. बाजार पूर्ति - बाजार पूर्ति को अल्‍प का‍लीन पूर्ति कहते है इस प्रकार के बाजार में पर्ति में कोई परिवर्तन नहीं होते है । बाजार में पूर्ति कुछ घटें या फिर एक दिन के लिए संबंध होता है ।  

2) अल्‍पकालीन पूर्ति - बाजार प‍ूर्ति की अपेक्षा कम समय में पूर्ति में वस्‍तु के विक्रेता के पास ज्‍यादा समय रहता है । इसी अधिक समय के कारण विक्रेता वस्‍तु की पूर्ति में मॉंग के अनुसार थोडी बहुत कमी या वृद्धि कर सकता है। परन्‍तु विक्रेता के पास इतना समय नहीं होता कि वह पूर्णतया वस्‍तु की पूर्ति के अनुरूप वस्‍तु की मूल्‍य में परिवर्तन कर सके । 

3) दीर्घकालीन पूर्ति - जैसा कि नाम से ही पता चलता है कि इसमें विक्रता के पास समय का अभाव नहीं पाया जात है । इसमें समय पर्याप्‍त मात्रा में होने के कारण विक्रेता अपनी वस्‍तु को वस्‍तु की प‍ूर्ति मॉंग के अनुसार बढा और घटा सकता है । यदि इसमें उत्‍पत्ति वृद्धि का नियम लागू होता है तो पूर्ति वक्र Åपर से नीचे की ओर होगा । और इसमें उत्‍पत्ति हास नियम की दशा में ये नीचे से Åपर को दायी ओर जाने वाल बनेगा।

4) सामूहिक पर्ति - जब वस्‍तु विशेष की पूर्ति विभिन्‍न माध्‍यमों के द्वारा की जाती है तो उसे सामूहिक पूर्ति कहते है । जैसे शक्ति सामूहिक पर्ति का उदाहरण है  क्‍योकि शक्ति आपूर्ति विद्युत से, कोयला, जल, पवन आदि से किया जा सकता है । 

5) संयुक्‍त पूर्ति - जब किसी वस्‍तु की पूर्ति को दो या दो से अधिक वस्‍तुए प्राप्‍त होती है तो उसे संयुक्‍त पूर्ति कहते है। 

 पूर्ति को प्रभावित करने वाले तत्व कौन कौन से हैं? purti ke niyam ko prabhavit karne wale karak

1) वस्‍तु विशेष की कीमत - वस्‍तु में अन्‍य बाते सामान्‍य रहे अधिक मूल्‍य पर वस्‍तु की मूल्‍य में विक्रेता को अधिक लाभ प्राप्‍त होता है तो इसलिए विक्रता उस वस्‍तु की मूल्‍य अधिक कर के बेचेगा । दूसरे शब्‍दों में वस्‍तु विशेष की मूल्‍य अधिक होने पर उसकी पर्ति अधिक होगी  । 

2)अन्य वस्तुओं की कीमतें  

अन्य वस्तुओं की कीमतें वस्तु विशेष की डिक्री ने लाभ की मात्रा को प्रभावित करते है। जैसे terikaut और रेशमी वस्त्रों की मूल्य बढ़ जाती है जबकि सूती वस्त्र की कीमत में कोई परिवर्तन नहीं होता है इस स्थिति में सूती वस्त्र की अपेक्षा कम लाभ प्राप्त होता है जिससे उसकी पूर्ति कम हो जाएगी।

3)उत्पादन के साधनों की कीमतें

यदि किसी वस्तु की उत्पादन में साधनों की कीमतें बढ़ जाती है तो उस वस्तु की उत्पादन लागत बढ़ जाएगी और उससे कुर्ती में कमी हो जाएगी यदी इसके विपरीत होता है कि उत्पादन के साधनों की मूल्य कम होती है तो वस्तु की लागत में कम होगी और उस वस्तु पूर्ति बढ़ेगी।


4)सरकार की कर नीति 

सरकार के कर नीति के कारण से भी वस्तु के मूल्य में प्रभाव पड़ता है यदि सरकार किसी वस्तु पर अधिक कर लगाती है तो वह वस्तु महंगी पड़ेगी और उसकी पूर्ति कम होगी।

5)तकनीकी ज्ञान

वर्तमान समय में तकनीकी ज्ञान से विभिन्न प्रकार की वस्तुओं की पूर्ति में निरंतर वृद्धि हो रही है तकनीकी सुधार में कम खर्चा लगता है और उत्पादन कर्ता का लाभ बढ़ जाता है इस कारण से वस्तुओ की पूर्ति में वृद्धि करते रहते हैं।

6उत्पादनकर्ता में परस्पर समझौता

कभी-कभी किसी निश्चित उद्देश्य की पूर्ति के लिए सभी उत्पादक मिलकर समझौता कर लेते हैं तब वस्तु की पूर्ति में कमियां वृद्धि हो सकती है।


7)परिवहन व संचार के साधन

यदि परिवहन व संचार के साधन विकसित है तो वस्तु की पूर्ति को नियंत्रित एवं पर्याप्त बनाए रखने में हमारी सहायता प्रदान करते हैं यदि किसी वस्तु की पूर्ति क्षेत्र में आवश्यकता से अधिक है और दूसरे क्षेत्र में आवश्यकता से कम है तो इन साधनों द्वारा संतुलित किया जा सकता है।

8)प्राकृतिक घटक

कुछ वस्तुओं का उत्पादन प्राकृतिक घाटको पर निर्भर करता है यदि प्राकृतिक घटक पक्ष में है तो वस्तु की पूर्ति बढ़ जाती है अन्यथा नहीं । जैसे कृषि क्षेत्र में यदि वर्षा पर्याप्त हो जाती है तो वस्तुओं की पूर्ति बढ़ जाती है। अगर वर्षा नहीं होती है तो वस्तुओं की पूर्ति घट जाती है।


पूर्ति के नियम के अपवाद लिखिए कोई 6

पूर्ति का नियम कौन सी वस्तु पर लागू नहीं होता है?

purti ke niyam ke apvad likhiye

पूर्ति के नियम के अपवाद लिखिए

1.भविष्य में कीमत परिवर्तन के आशा

पूर्ति का नियम उस समय में लागू नहीं हो पाता जहां आशा हो की वस्तु की कीमत भविष्य में अभी और परिवर्तन होंगे। 

यदि किसी वस्तु की कीमत बढ़ जाए तथा यह आशा हो कि भविष्य में इसकी कीमत और बढ़ेगी तो उस वस्तु को पूर्ति बढ़ने के स्थान पर घट जाएगी क्योंकि उत्पादन करता और विक्रेता इसका अधिक स्टॉक रखना पसंद करेंगे।


कृषि उत्पादन संबंधी वस्तुओं पर लागू नहीं होता 

कृष वस्तुओं के उत्पादन पर भी यह नियम लागू नहीं होता है क्योंकि प्राकृतिक पर अधिक निर्भर है अतः मूल्य में बढ़े होने पर भी कृषि क्षेत्र में उत्पादन बढ़ाना आवश्यक नहीं होता।

नीलामी की वस्तुओं पर लागू ना होना

यह नियम नीलामी की वस्तुओं पर लागू नहीं होता है क्योंकि ऐसी वस्तुएं की पूर्ति हमेशा सीमित रहती है और इससे ना तो घटाया जा सकता है और ना ही बढ़ाया जा सकता है।

श्रेष्ठ कलात्मक वस्तुओं पर भी यह नियम लागू नहीं होता

ऐसी वस्तुएं जिनकी कीमत बढ़ने पर भी उनकी पूर्ति नहीं पढ़ाया जा सकता है उन वस्तुओं पर यह नियम लागू नहीं होता है।

अल्पविकसित तथा पिछड़े देशों में श्रम की पूर्ति पर लागू नहीं होता है

पूर्ति का नियम रोजगार के क्षेत्र की पूर्ति पर लागू नहीं होता है विशेषकर अल्पविकसित देशों में श्रम की पूर्ति इस नियमानुसार नहीं होती है।


पूर्ति के नियम की मान्यताएं क्या है?\पूर्ति के नियम की मान्यताएं

पूर्ति का नियम कौन सी वस्तु पर लागू नहीं होता है? purti ki manyata


1.क्रेता और विक्रेता की आय में कोई परिवर्तन नहीं होना चाहिए

2.वस्तु के क्रेता एवं विक्रेताओं की आदत स्वभाव एवं रुचि में कोई परिवर्तन नहीं होना चाहिए

3.वस्तु की उत्पादन के साधनों की मूल्य सामान्य मान ली जाती हैं

4.उत्पादन की तकनीक में कोई परिवर्तन नहीं होना चाहिए

5..वस्तु की कीमत में थोड़ा परिवर्तन होने के हर स्‍वरूप पूर्व में भी परिवर्तन होना चाहिए।



purti ka niyam kya hai

purti kise kahate hain

purti ke niyam ki vyakhya kijiye

purti ki manyata





उपभोक्‍ता व्‍यवहार अ‍र्थ /upbhokta-vyavhar-arth

June 07, 2025

 

उपभोक्‍ता व्‍यवहार upbhokta-vyavhar-arth

 पहले आप उपभोक्‍ता कहते किसे है जो व्‍यक्ति किसी वस्‍तु का उपयोग करता है उसे उपभोक्‍ता कहते है । जैसे जब मनुष्‍य अपने जीवन में बहुत सी वस्‍तुओं का उपभोग करता है । लेकिन जब उसे वस्‍तु को उपभोग करने में स्‍वभाव या व्‍यवहार में बहुत से तत्‍व / घटको से प्रभावित होने लगता है। पर वह अपनी सीमित आय या कम पैसों के उपयोग से अलग - अलग प्रकार की आवश्‍यकताओं की पूरा करने के लिए करता है । तथा  ऐसे वस्‍तुओं को सम्मिलित करता है जिससे उसको अधिक से अधिक संतुष्टि प्राप्‍त हो । तब उस स्थिति में वह सन्‍तुलन में है । प्रत्‍येक व्‍यक्ति या उपभोक्‍ता को वस्‍तओं की उपयोगिता या उपभोग करने का महत्‍व अलग अलग होता है। उपभोक्‍ता का व्‍यवहार वस्‍तुओं से प्राप्‍त होने वाली उपयो्गिता से प्रभावित होता है। 


Friday, January 31, 2025

बाजार का अर्थ क्‍या है एवं परिभाषा, बाजार के प्रकार एवं विशेषताएँ

January 31, 2025

 


बाजार क्या है यह कितने प्रकार के होते हैं?

बाजार का क्या अर्थ लिखिए?/

बाजार एक ऐसे स्थान को कहते हैं जहां पर किसी वस्तु के क्रेता तथा विक्रेता एकत्रित होते हैं और वस्तुओं का क्रय विक्रय करते हैं परंतु अर्थशास्त्र में बाजार का अर्थ भिंन्‍न बताया गया है अर्थशास्त्र में बाजार का अर्थ एक ऐसे स्थान से है जहां किसी वस्तु के क्रेता विक्रेता फैले होते हैं उनमें स्वतंत्र प्रतियोगिता होती है जिसके कारण वस्तु के मूल्य में एक समान पाई जाती है उसे बाजार कहते हैं।


अर्थशास्त्र में बाजार की परिभाषा दीजिए

प्रोफ़ेसर मार्शल के अनुसार- बाजार शब्द से आशय किसी विशेष स्थान से नहीं होता जहां वस्तुएं खरीदी बेची जाती हो बल्कि मैसेज समस्त क्षेत्र से होता है जहां पर पिता विक्रेताओं के बीच स्वतंत्र रूप से लेनदेन हो जिससे किसी भी वस्तु का मूल्य सहज एवं सामान्य रूप से प्रगति रखता हो।


प्रोफेसर एली के अनुसार 

बाजार का अभिप्राय किसी ऐसे सामान्य क्षेत्र से होता है जिसमें वस्तु का मूल्य निर्धारित करने वाली शक्ति कार्यशील होती है।

प्रोफ़ेसर कूर्नो के अनुसार

 अर्थशास्त्र में बाजार शब्द का अर्थ ऐसे स्थान से नहीं होता है जहां पर वस्तु का क्रेता विक्रेता होता है बल्कि उस समस्त क्षेत्र से होता है जहां पर केता विक्रेता स्वतंत्र रूप से संबंध होता है  वस्तु की मूल्य में सरलता एवं शीघ्रता से एक समान पाई जाती है।

बाजार के प्रकार

क्षेत्र के आधार पर बाजार का प्रकार

क्षेत्र के आधार पर बाजार का वर्गीकरण

स्थानीय बाजार किसे कहते हैं

स्थानी बाजार से कुछ बाजार से होता है जिसमें क्रेता विक्रेता एक छोटे स्थान तक ही सीमित होते हैं इस बाजार के अंतर्गत आती हैं जो कम समय में नष्ट हो जाती है जैसे दूध दही सब्जी मछली अंडा आदि होता है।


प्रादेशिक बाजार किसे कहते हैं

इस बाजार को दूसरे नाम से भी जाना जाता है प्रांतीय बाजार या बाजार स्थानीय बाजार से ज्यादा बड़ा होता है इसमें वस्तु की महक बड़े क्षेत्रों अथवा प्रदेश तक ही सीमित होती है उदाहरण के लिए लाख की चूड़ियां का बाजार एक व्यापार है क्योंकि यह राजस्थान तक ही सीमित है।


राष्ट्रीय बाजार किसे कहते हैं

जब किसी वस्तु के क्रेता विक्रेता पूरे देश में फैले हुए होते हैं तो उस वस्तु का बाजार राष्ट्रीय बाजार कहलाता है जैसे साड़ियां तथा चूड़ियां आज की मांग संपूर्ण देश में होती है इसलिए इनका बाजार राष्ट्रीय बाजार कहलाता है।


अंतरराष्ट्रीय बाजार किसे कहते हैं

यदि किसी वस्तु को खरीदने एवं बेचने वाले व्यापारी पूरे देश में पाए जाते हैं और जिस वस्तु की मांग पूरे संसार की माघ हो उसे अंतरराष्ट्रीय बाजार कहते हैं जैसे सोना चांदी को हूं आदि अंतरराष्ट्रीय बाजार की वस्तुएं के अंतर्गत आती है।


बाजार के प्रकार PDF

समय के आधार पर बाजार का प्रकार

समय के आधार पर बाजार कितने प्रकार के होते हैं?

अल्पकालीन बाजार क्या होता है?

दैनिक बाजार या अल्पकालीन बाजार

यह बाजार वस्तुओं का बाजार होता है जो शीघ्र अति शीघ्र नष्ट होने वाली या खराब होने वाली होती हैं जैसे दूध दही मछली सब्जी यह निश्चित किया जाता है कि इनकी पूर्ति में वृद्धि संभव नहीं आता ऐसी परिस्थिति में मां का महत्व अधिक होता है।

अल्पकालिक बाजार

अल्पकालिक बाजार में मां की अधिक महत्व होता है किंतु समय अधिक हो जाने पर और उन्हें सुधार करना या परिवर्तन करने की संभव होता है


दीर्घकालीन बाजार से आप क्या समझते हैं?

सिया बाजार ऐसे वस्तुओं का बाजार होता है जो बहुत समय पर नष्ट नहीं होते हैं और इनकी पूर्ति बढ़ाया जा सकता है जैसे गेहूं चावल चीनी वस्त्र आदि इन्हीं वर्ग में आते हैं क्योंकि नष्ट नहीं होते हैं।


अति दीर्घकालीन बाजार किसे कहते हैं

इस तरह के बाजार को युग कालीन बाजार भी कहा जाता है क्योंकि इसमें वस्तु की नष्ट होने की संभावना बहुत लंबे समय तक होती है और बहुत अधिक टिकाऊ होती है इस कारण से इसे कालीन बाजार भी कहा जाता है।


कार्य के आधार पर बाजार का वर्गीकरण 

विशिष्ट बाजार क्या है

इस बाजार में केवल एक ही प्रकार की वस्तु का क्रय विक्रय किया जाता है जैसे गल्ला मंडी सब्जी मंडी आदि

सामान्य या मिश्रित बाजार क्या है

इस बाजार के अंतर्गत सभी प्रकार के वस्तुओं का क्रय विक्रय किया जाता है ऐसे बाजार साधारण सा सभी स्थानों पर पाए जाते हैं जहां पर खुदरा एवं फुटकर व्यापार किया जाता है।

नमूने द्वारा बिक्री से आप क्या समझते हैं?

वर्तमान समय में बड़े पैमाने में क्रय विक्रय करने के लिए प्रतिनिधियों को वस्तुओं के नमूने दे देती है उन नामों के आधार पर वस्तुओं को बुक करने का आर्डर प्राप्त करते हैं जैसे कपड़े के नमूने पेंट ऑन आदि सामान्य शब्दों में ऐसा कह सकते हैं कि जो बड़ी-बड़ी कंपनियां सैंपल के आधार पर विक्रेताओं को दिया जाता है उसके बाद विक्रेता उस हिसाब से उसे करें करता है और माल को बुक करता है।


ग्रेडो द्वारा बिक्री

जब बाजार सभी प्रकार से विकसित हो जाता है तो माल की बिक्री ग्रेडों के आधार पर होती है। अलग-अलग प्रकार की वस्तुओं को विभिन्न प्रकार की ग्रेडो में बांट दिया जाता है सभी का अलग-अलग नाम दे दिया जाता है और उसे खरीदी जाने वाली वस्तु का पूरा ज्ञान होता है।


प्रतियोगिता के आधार पर बाजार का वर्गीकरण

पूर्ण बाजार

पूर्ण बाजार वह स्थिति होती है जिसमें कोई भी क्रेता विक्रेता व्यक्तिगत रूप से बाजार के मूल को प्रभावित करने की स्थिति में नहीं होता । पूर्ण प्रतियोगिता की स्थिति क्रेता पूर्णतया लोचदार कोर्ट की स्थिति तथा विक्रेता पूर्णतया लोचदार मांग की स्थिति का सामना करता है। अर्थात वस्तु का बाजार में एक मूल्य होता है।


अपूर्ण बाजार

जब किसी वस्तु के बाजार में पूर्ण प्रतियोगिता नहीं होती तो उसे अपूर्ण बाजार कहते हैं। अपूर्ण बाजार में खेता विक्रेताओं की जनसंख्या कम होती है और श्वेता तथा विक्रेता को बाजार का पूरा ज्ञान नहीं होता इसलिए बाजार में केंद्रों पर वस्तु का क्रय विक्रय हो रहा है उसका परिणाम स्वरूप भिन्न होता है।


कानून के आधार पर बाजार के प्रकार बताइए

कानून की दृष्टि से बाजार दो प्रकार के होते हैं

वैध बाजार क्या है

जिस बाजार में उपभोक्ताओं को सरकार द्वारा निर्धारित किए गए पैसों या मूल्यों पर वस्तुएं मिलती हैं उन्हें वैध उचित बाजार कहते हैं ।

चोर बाजार का मतलब क्या है?

इस बाजार में विक्रेता द्वारा वस्तुओं को निश्चित मूल्य से अधिक मूल्य पर बेचा जाता है। इसमें यह देखा गया है कि विक्रेता बिना रसीद दिए ही वस्तु का विक्रय करता है।

बाजार संरचना की 5 विशेषताएं क्या हैं?

बाजार अर्थव्यवस्था की 7 विशेषताएं क्या हैं?

वस्तु

हम बाजार में किसी ना किसी वस्तु का होना आवश्यक है जिसका क्रय विक्रय होता हो बिना वस्त्र के बाजार की कल्पना नहीं की जा सकती है।

क्रेता तथा विक्रेता

विनिमय में करने के लिए क्रेता तथा विक्रेता का होना आवश्यक है। क्रेता विक्रेता वस्तु की माग को संतुलन करता है। 

एक क्षेत्र

अर्थशास्त्र में बाजार के लिए ए क्षेत्र होना आवश्यक है चाहे वह बड़ा हो या छोटा उसमें किसी वस्तु का क्रय विक्रय क्रेतायो तथा विक्रेताओं के माध्यम होता है।


स्वतंत्र प्रतियोगिता

बाजार के समस्त क्षेत्र में वस्तु की बिक्री के संबंध में क्रेता तथा विक्रेताओं के बीच प्रतिस्पर्धा होता है। 

एक वस्तु का एक समय पर एक मूल्य

बाजार के क्रेता विक्रेताओं के मध्य पूर्ण प्रतियोगिता होती है जिसके कारण बाजार में एक समय पर एक वस्तु की एक ही कीमत होती है जो कि व्यवहार में ऐसा नहीं होता है।


इन सभी को पढे

1. कीन्स के रोजगार सिद्धांत को समझाइए pdf



बजट क्या है, अर्थ, परिभाषा, प्रकार, विशेषताएं, महत्‍व, निर्माण की प्रक्रिया क्‍या है

January 31, 2025

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budget ka arth
budget ki visheshtaen
budget ke prakar




बजट क्या है, अर्थ, परिभाषा, प्रकार, विशेषताएं, महत्‍व,


बजट का क्या अर्थ लिखिए? / budget ka arth

बजट शब्द की उत्पत्ति फ्रांसीसी शब्द के  Bougette अर्थात चमड़े के थैले से हुआ है जिसमें आय और व्यय का अनुमान लगाया जाता है! खर्च को करने के लिए विभिन्न साधनों तथा पद्धतियों का प्रयोग किया जाता है और 1 वर्ष के विवरण को बताता है

 

बजट सरल परिभाषा क्या है?/budget ki paribhasha

विलोबी के अनुसार - बजट एक साथ ही एक रिपोर्ट या कह सकते अनुमान प्रस्ताव या एक ऐसा यंत्र है जिसकी सहायता से वित्तीय प्रशासन के समस्त क्रियाओं का समन्वय स्थापित करता है।

रेने स्टोर्न के अनुसार बजट है एक ऐसा प्रपत्र है जिसमें सार्वजनिक आय और व्यय की स्वीकार की हुई योजनाएं समाहित होती है

टेलर के अनुसारबजट सरकार के मास्टर वित्तीय योजना है भविष्य में आने वाली आय का अनुमान तथा बजट वर्ष के रखता प्रस्तावित खर्चों के अनुमान साथ साथ प्रदान करता है।

बजट किसे कहते हैं बजट कितने प्रकार के होते हैं?

भविष्य में आने वाले वर्ष के लिए सरकार द्वारा खर्च के अनुमानित आंकड़ों तथा चालू वर्ष के वित्तीय गतिविधियों और सरकार द्वारा प्रस्तावित आर्थिक नीति के संबंध ब्यौरा को बजट कहा जाता है।


बजट कितने प्रकार के होते हैं?

बजट क्या है इसके विभिन्न प्रकारों का वर्णन करें?

भारत में बजट कितने प्रकार के होते हैं?

अर्थशास्त्र में बजट कितने प्रकार के होते हैं?

संतुलित बजट किसे कहते हैं?

1. संतुलित बजट 

जब बजट में आय और व्यय की राशि समान होती है तो उसे संतुलित बजट कहते हैं यह एक आदर्श अर्थव्यवस्था होती है। इसका पालन कर पाना बहुत कठिन होता है आजकल सरकार चाहते हुए भी संतुलित बजट बनाना कठिन है क्योंकि सार्वजनिक खर्चे बढ़ने के कारण ऐसा संभव नहीं है।

असंतुलित बजट क्या है?

2. असंतुलित बजट

जब किसी वर्ष शासन को प्राप्त होने वाली सरकार द्वारा किए जाने वाले खर्च के बराबर नहीं होती है तो उसे असंतुलित बजट कहा जाता है

 असंतुलित बजट कितने प्रकार के होते हैं?

 2.1घाटे का बजट

 जैसा कि नाम से ही स्पष्ट होता है कि जब सरकार की आय तुलना में खर्च अधिक कर देती है तो उसे घाटे का बजट कहते हैं वर्तमान समय में घाटे का बजट सबसे ज्यादा प्रचलित है ।

 देश में कुल माग को वृद्धि करके आर्थिक क्रियाओं को ऊंचा रखने के लिए सरकार खर्च अधिक करती है जिसकी तुलना में वह आय सीमित तक ही रह जाती है इस कारण से घाटे का बजट होता है

 2.2 आधिक्य बजट

 यह बजट घाटे के बजट से उल्टा होता है सरकार आय की तुलना में खर्च को कम करती है तो किस प्रकार के बजट को आधिक्य के बजट कहा जाता है वर्तमान समय में इस प्रकार के बजटो को नहीं बनाया जा रहा है।

 3. सामान्य बजट क्या है?

 सामान्य बजट का निर्माण सामान्य परिस्थितियों में वार्षिक आधार पर किया जाता है। उन्हें सामान्य बजट कहा जाता है। परंतु सरकार द्वारा इस प्रकार के बजटो का समस्त क्रियाओं की सही-सही विवरण नहीं देते हैं।

4. पूंजी बजटिंग से आप क्या समझते हैं?

 इस तरह के बजट के अंतर्गत केवल पूंजीगत मधु को ही सम्मिलित किया जाता है और इस प्रकार के बजट को सामान्य बजटो से अलग रखा जाता है इस बजट के खर्च को सार्वजनिक मदो  द्वारा ऋणों पूरा किया जाता है।

 5. अंतरिम बजट से आप क्या समझते हैं?

 जब सरकार किसी कारणवश पूरे वर्ष के आए और खर्च के अनुमान को तैयार करने में असमर्थ रहती है तो वर्ष के कुछ महीनों में होने वाले आर्थिक व्यवस्था को बनाए रखने के लिए आय व्यय के प्रदान किए जाते हैं।

 6. आपातकालीन बजट  क्या है

 जब किसी देश के अंदर  प्राकृतिक प्रकोप या फिर आर्थिक संकट जैसे स्थिति आ जाती है तो इसका निवारण करने के लिए साधारण बजट  की अपेक्षा संकटकालीन बजट का सहारा लिया जाता है इन बजट  में संकट का समाधान करने के लिए व्यवस्था की जाती है ।

भुगतान संतुलन अर्थ क्‍या है  भुगतान संतुलन की परिभाषा, भुगतान संतुलन कितने प्रकार

7. पूरक बजट क्या है

जब कभी सरकार द्वारा पास कराए गए बजट की राशि खर्च करने में कम पड़ जाती है तो सरकार को नई मद पर व्यय करना होता है तो इसके लिए पूरक बजट पास किया जाता है।

8. बहुउद्देशीय बजट क्या है

इस प्रकार का बजट का मुख्य लक्ष्य देश में वित्तीय नियंत्रण करना होता है और वित्तीय योजना को सफल बनाना होता है इस प्रकार के बजट अल्पकालीन होते हैं।


बजट की विशेषताएं / budget ki visheshtaen

1. विवरण

बजट एक प्रकार का विवरण होता है जिसमें आमदनी और खर्च का हिसाब किताब लिखा जाता है यह विस्तार रूप में दिया जाता है जिससे संपूर्ण जानकारी प्राप्त किया जा सके।

2.वित्तीय बातें

बजट में केवल वित्तीय बातों का हिसाब किताब दिया जाता है और गैर वित्तीय बातों का इस बजट में कोई संबंध नहीं होता है।

3. नकदी का आधार

बजट का निर्माण नकली आधार पर किया जाना चाहिए क्योंकि राज उधार राशियों का वर्णन बजट के बाहर रखा जाता है।

4. वार्षिक आधार

बजट एक निश्चित समय के अंदर सामान्यता 1 वर्ष की अवधि के लिए ही बनाया जाता है।

5. सामीप्य बजट 

इस बजट से आज से यह है कि बजट के अनुमानित एवं वास्तविक आंकड़ों के निकट कम होने चाहिए जितना अंतर कम होगा वह उतना ही प्रभावी और निपुण माना जाएगा।

बजट के उद्देश्य बताइए

बजट की आवश्यकता एवं महत्व/budget ka mahatva 

1. हिसाब देयता

बजट का मुख्य उद्देश्य हिसाब देने का है लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में कोई भी न्याय व करारोपण बिना संवाद व विधानसभा की अनुमति नहीं किया जाता है बजट में इस बात की व्यवस्था की जाती है कि खर्च के लिए जितनी राशि स्वीकृत की जाती है उससे अधिक राशि वह नहीं की जानी चाहिए।

2.आय व्यय का अनुमान लगाना

बजट के आधार पर देश की कुल आय एवं कुल व्यय अनुमान का लगाया जाता हैं ब्याज के आधार पर आय को प्राप्त करने के लिए संसाधनों की खोज की जाती है।

3.योजना से संबंधित

बजट का मुख्य उद्देश्य योजना से संबंधित है जो भी बजट बनाया जाता है उसमें योजना को सम्मिलित किया जाता है इस प्रकार योजना बनाई जाती है कि वह बजट का रूप धारण कर लेती है क्योंकि भविष्य में आय तथा व्यय को ध्यान में रखकर योजनाओं का निर्माण किया जाता है।

4.राजकोषीय उपकरण

बजट राजकोषीय नीत का एक प्रमुख उपकरण है जोकि अर्थव्यवस्था में बाहरी लक्ष्य को  पूर्ति करने के लिए प्रतिरूप एवं सामाजिक ऋण के प्रबंधन द्वारा आर्थिक विकास और रोजगार कीमत में स्थिरता तथा आय एवं संपत्ति के वितरण में विषमता को कम करता है।

  5.प्रशासकीय कुशलता

  विभिन्न अधिकारियों के क्षेत्र में उत्तरदायित्व को स्पष्ट करके प्रशासन में कुशलता बनाए रखना।

  

भारत में बजट निर्माण की प्रक्रिया का व्याख्या करें

भारत में बजट प्रक्रिया pdf

भारत में बजट निर्माण के प्रमुख कितने चरण हैं

1.बजट की तैयारी

बजट को तैयार करने से पहले सभी विभागों एवं मंत्रालय को सूचित कर दिया जाता है। 

2.बजट को पेश करना

बजट तैयार करने के बाद उसे परिषद में प्रस्तुत किया जाता है और भारत में हिंदी तथा अंग्रेजी भाषा में यह बजट प्रस्तुत किया जाता है।

3.सामान्य बहस

वित्त मंत्री द्वारा लोकसभा में बजट को प्रस्तुत करने के बाद उस पर निर्धारित इस पर विचार विमर्श आरंभ होता है जो कि 2 से 4 दिन तक चलता है।

4.मतदान

सामान्य विचार विमर्श के बाद बजट पर मतदान किया जाता है मतदान की दृष्टि से बजट में दो प्रकार के मतदान किया जाता है!

4.1. मतदान अयोग्‍य मदें - इसमें वह खर्च शा‍म‍िल किये जाते है जिन प लोकसभााको मतदान करने की आवश्‍यता नही होती है । 

4.2.  मतदान योग्‍य मदें - इसमें उन मदों को शा‍म‍िल किया जाता है जिन पर मतदान की आवश्‍यकता होती है ।

5. बजट कस क्रियान्‍वयन - 

बजट के क्रियान्‍वयन के द्वारा आय को एकत्रित करता है प्राप्‍त आय को व्‍यय करना तथा वित्तिय हिसाबों का अंकेक्षण करना और उनको समलित करना ।

  


बाजार का अर्थ , परिभाषा, प्रकार , व‍िशेषताएँँ , तत्‍व

January 31, 2025

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बाजार का अर्थ प्रकार व‍िशेेषताऍं


 अर्थशास्त्र में बाजार का क्या अर्थ है?/ bajar ka arth?

बाजार एक ऐसे स्थान को कहते हैं जहां पर किसी वस्तु के क्रेता तथा विक्रेता एकत्रित होते हैं और वस्तुओं का क्रय विक्रय करते हैं परंतु अर्थशास्त्र में बाजार का अर्थ भिंन्‍न बताया गया है अर्थशास्त्र में बाजार का अर्थ एक ऐसे स्थान से है जहां किसी वस्तु के क्रेता विक्रेता फैले होते हैं उनमें स्वतंत्र प्रतियोगिता होती है जिसके कारण वस्तु के मूल्य में एक समान पाई जाती है उसे बाजार कहते हैं।


bajar ka paryayvachi shabd
बाजार का पर्यावाची शब्‍द है - हाट 

अर्थशास्त्र में बाजार की परिभाषा दीजिए/ bajar ki paribhasha likhiye?


प्रोफ़ेसर मार्शल के अनुसार- बाजार शब्द से आशय किसी विशेष स्थान से नहीं होता जहां वस्तुएं खरीदी बेची जाती हो बल्कि मैसेज समस्त क्षेत्र से होता है जहां पर पिता विक्रेताओं के बीच स्वतंत्र रूप से लेनदेन हो जिससे किसी भी वस्तु का मूल्य सहज एवं सामान्य रूप से प्रगति रखता हो।

bajar ki do paribhasha likhiye

प्रोफेसर एली के अनुसार 

बाजार का अभिप्राय किसी ऐसे सामान्य क्षेत्र से होता है जिसमें वस्तु का मूल्य निर्धारित करने वाली शक्ति कार्यशील होती है।

प्रोफ़ेसर कूर्नो के अनुसार

 अर्थशास्त्र में बाजार शब्द का अर्थ ऐसे स्थान से नहीं होता है जहां पर वस्तु का क्रेता विक्रेता होता है बल्कि उस समस्त क्षेत्र से होता है जहां पर केता विक्रेता स्वतंत्र रूप से संबंध होता है  वस्तु की मूल्य में सरलता एवं शीघ्रता से एक समान पाई जाती है।

बाजार के प्रकार / bajar ke prakar

क्षेत्र के आधार पर बाजार का प्रकार


स्थानीय बाजार किसे कहते हैं

स्थानी बाजार से कुछ बाजार से होता है जिसमें क्रेता विक्रेता एक छोटे स्थान तक ही सीमित होते हैं इस बाजार के अंतर्गत आती हैं जो कम समय में नष्ट हो जाती है जैसे दूध दही सब्जी मछली अंडा आदि होता है।


प्रादेशिक बाजार किसे कहते हैं

इस बाजार को दूसरे नाम से भी जाना जाता है प्रांतीय बाजार या बाजार स्थानीय बाजार से ज्यादा बड़ा होता है इसमें वस्तु की महक बड़े क्षेत्रों अथवा प्रदेश तक ही सीमित होती है उदाहरण के लिए लाख की चूड़ियां का बाजार एक व्यापार है क्योंकि यह राजस्थान तक ही सीमित है।


राष्ट्रीय बाजार किसे कहते हैं

जब किसी वस्तु के क्रेता विक्रेता पूरे देश में फैले हुए होते हैं तो उस वस्तु का बाजार राष्ट्रीय बाजार कहलाता है जैसे साड़ियां तथा चूड़ियां आज की मांग संपूर्ण देश में होती है इसलिए इनका बाजार राष्ट्रीय बाजार कहलाता है।


अंतरराष्ट्रीय बाजार किसे कहते हैं

यदि किसी वस्तु को खरीदने एवं बेचने वाले व्यापारी पूरे देश में पाए जाते हैं और जिस वस्तु की मांग पूरे संसार की माघ हो उसे अंतरराष्ट्रीय बाजार कहते हैं जैसे सोना चांदी को हूं आदि अंतरराष्ट्रीय बाजार की वस्तुएं के अंतर्गत आती है।


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समय के आधार पर बाजार का प्रकार

अल्पकालीन बाजार क्या होता है?

दैनिक बाजार या अल्पकालीन बाजार

यह बाजार वस्तुओं का बाजार होता है जो शीघ्र अति शीघ्र नष्ट होने वाली या खराब होने वाली होती हैं जैसे दूध दही मछली सब्जी यह निश्चित किया जाता है कि इनकी पूर्ति में वृद्धि संभव नहीं आता ऐसी परिस्थिति में मां का महत्व अधिक होता है।

अल्पकालिक बाजार

अल्पकालिक बाजार में मां की अधिक महत्व होता है किंतु समय अधिक हो जाने पर और उन्हें सुधार करना या परिवर्तन करने की संभव होता है


दीर्घकालीन बाजार से आप क्या समझते हैं?

सिया बाजार ऐसे वस्तुओं का बाजार होता है जो बहुत समय पर नष्ट नहीं होते हैं और इनकी पूर्ति बढ़ाया जा सकता है जैसे गेहूं चावल चीनी वस्त्र आदि इन्हीं वर्ग में आते हैं क्योंकि नष्ट नहीं होते हैं।


अति दीर्घकालीन बाजार किसे कहते हैं

इस तरह के बाजार को युग कालीन बाजार भी कहा जाता है क्योंकि इसमें वस्तु की नष्ट होने की संभावना बहुत लंबे समय तक होती है और बहुत अधिक टिकाऊ होती है इस कारण से इसे कालीन बाजार भी कहा जाता है।


कार्य के आधार पर बाजार का वर्गीकरण 

विशिष्ट बाजार क्या है

इस बाजार में केवल एक ही प्रकार की वस्तु का क्रय विक्रय किया जाता है जैसे गल्ला मंडी सब्जी मंडी आदि

सामान्य या मिश्रित बाजार क्या है

इस बाजार के अंतर्गत सभी प्रकार के वस्तुओं का क्रय विक्रय किया जाता है ऐसे बाजार साधारण सा सभी स्थानों पर पाए जाते हैं जहां पर खुदरा एवं फुटकर व्यापार किया जाता है।

नमूने द्वारा बिक्री से आप क्या समझते हैं?

वर्तमान समय में बड़े पैमाने में क्रय विक्रय करने के लिए प्रतिनिधियों को वस्तुओं के नमूने दे देती है उन नामों के आधार पर वस्तुओं को बुक करने का आर्डर प्राप्त करते हैं जैसे कपड़े के नमूने पेंट ऑन आदि सामान्य शब्दों में ऐसा कह सकते हैं कि जो बड़ी-बड़ी कंपनियां सैंपल के आधार पर विक्रेताओं को दिया जाता है उसके बाद विक्रेता उस हिसाब से उसे करें करता है और माल को बुक करता है।


ग्रेडो द्वारा बिक्री

जब बाजार सभी प्रकार से विकसित हो जाता है तो माल की बिक्री ग्रेडों के आधार पर होती है। अलग-अलग प्रकार की वस्तुओं को विभिन्न प्रकार की ग्रेडो में बांट दिया जाता है सभी का अलग-अलग नाम दे दिया जाता है और उसे खरीदी जाने वाली वस्तु का पूरा ज्ञान होता है।


प्रतियोगिता के आधार पर बाजार का वर्गीकरण

पूर्ण बाजार

पूर्ण बाजार वह स्थिति होती है जिसमें कोई भी क्रेता विक्रेता व्यक्तिगत रूप से बाजार के मूल को प्रभावित करने की स्थिति में नहीं होता । पूर्ण प्रतियोगिता की स्थिति क्रेता पूर्णतया लोचदार कोर्ट की स्थिति तथा विक्रेता पूर्णतया लोचदार मांग की स्थिति का सामना करता है। अर्थात वस्तु का बाजार में एक मूल्य होता है।


अपूर्ण बाजार

जब किसी वस्तु के बाजार में पूर्ण प्रतियोगिता नहीं होती तो उसे अपूर्ण बाजार कहते हैं। अपूर्ण बाजार में खेता विक्रेताओं की जनसंख्या कम होती है और श्वेता तथा विक्रेता को बाजार का पूरा ज्ञान नहीं होता इसलिए बाजार में केंद्रों पर वस्तु का क्रय विक्रय हो रहा है उसका परिणाम स्वरूप भिन्न होता है।


कानून के आधार पर बाजार के प्रकार बताइए

कानून की दृष्टि से बाजार दो प्रकार के होते हैं

वैध बाजार क्या है

जिस बाजार में उपभोक्ताओं को सरकार द्वारा निर्धारित किए गए पैसों या मूल्यों पर वस्तुएं मिलती हैं उन्हें वैध उचित बाजार कहते हैं ।

चोर बाजार का मतलब क्या है?

इस बाजार में विक्रेता द्वारा वस्तुओं को निश्चित मूल्य से अधिक मूल्य पर बेचा जाता है। इसमें यह देखा गया है कि विक्रेता बिना रसीद दिए ही वस्तु का विक्रय करता है।


बाजार की विशेषताएं क्या हैं?/ bajar ki visheshta


वस्तु

हम बाजार में किसी ना किसी वस्तु का होना आवश्यक है जिसका क्रय विक्रय होता हो बिना वस्त्र के बाजार की कल्पना नहीं की जा सकती है।

क्रेता तथा विक्रेता

विनिमय में करने के लिए क्रेता तथा विक्रेता का होना आवश्यक है। क्रेता विक्रेता वस्तु की माग को संतुलन करता है। 

एक क्षेत्र

अर्थशास्त्र में बाजार के लिए ए क्षेत्र होना आवश्यक है चाहे वह बड़ा हो या छोटा उसमें किसी वस्तु का क्रय विक्रय क्रेतायो तथा विक्रेताओं के माध्यम होता है।


स्वतंत्र प्रतियोगिता

बाजार के समस्त क्षेत्र में वस्तु की बिक्री के संबंध में क्रेता तथा विक्रेताओं के बीच प्रतिस्पर्धा होता है। 

एक वस्तु का एक समय पर एक मूल्य

बाजार के क्रेता विक्रेताओं के मध्य पूर्ण प्रतियोगिता होती है जिसके कारण बाजार में एक समय पर एक वस्तु की एक ही कीमत होती है जो कि व्यवहार में ऐसा नहीं होता है।



बाजार के लिए सर्वाधिक आवश्यक तत्व क्या है?/ bajar ke tatv


सर्वव्यापी मांग

ऐसे वस्तु जिनकी मांग व्यापक या लगातार बढ़ती जाती है उन वस्तुओं का बाजार उतना ही बढ़ता जाता है जैसे सोना चांदी गेहूं चावल आग की विश्व भर में मांग बढ़ती जा रही है और इनका बाजार अंतरराष्ट्रीय बाजार के अंतर्गत आता है।

वहनीयता

जिन वस्तुओं का आसानी से एक जगह से दूसरी जगह वस्तु को लाया जा सके उनमें वाहनीय गुण होता है। वाहनीय होने की कारण इसका बाजार विस्तृत होता है।

क्योंकि जहां पर लोग अपने वस्तु को मंगाते हैं वहां आसानी से पहुंच जाता है जैसे सोना चांदी जावरा कपड़ा आदि।

टीकाऊपन 

ऐसी वस्तुएं जो शीघ्रता से नष्ट नहीं होती तथा लंबे समय तक चलती रहती है से टिकाऊ वस्तुएं कहते हैं उनका बाजार विस्तृत होता है जैसे मशीन यंत्र सोना चांदी आज टिकाऊ वस्तु होते हैं।


पूर्ति की पर्याप्तता

ऐसी वस्तुएं जिनकी पूर्ति को आवश्यकता आने पर बढ़ाया जा सकता है और उनका बाजार विस्तृत होता है।


ग्रेड या नमूने में बाटने की सुविधा

जिन वस्तुओं की ग्रेड बनाए जा सकते हैं और उनको नमूने के तौर पर ग्राहकों को दिखाया जाता है उनका  बाजार विस्तृत होता है जैसे कपड़ा चाय चीनी आदि





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