07/01/2024
T.d.i.p.s.nursing college rewa (mp)
Add. Sirmour Road Lauwa Laxmanpur Rewa(MP)
This college is situated in Sirmaur Road, 13 kilometers away from Rewa city. Different labs have been made for this college practical which makes it easier for the students to understand. Here teachers teach through projectors. All students are given separate computers so that they can get education in a better way.
G.N.M.
B.Sc. (Nursing)
B.Sc (Post Basic) Regular: 2 yrs Distance: 3 yrs
M. Sc. 2 years
1. Minimum education eligibility criteria for admission to GNM: 10+2 with English and must have obtained a minimum of 40% at the qualifying examination and English individually from any recognized board. Candidates are also eligible from State Open School recognized by State Government and National Institute of Open School (NIOS) recognized by Central Government. However Science is preferable. Three (core elective) subject marks may be taken for calculating the percentage of marks excluding the marks in English. Also, it has to be ensured the candidate has pass
marks in English.10+2 with English having 40% of marks in vocational ANM course from the school recognized by Indian Nursing Council.
10+2 with English having 40% of marks in Vocational Stream Health care Science from a recognized CBSE board/State/Centre.
Registered ANM with pass marks
1. The minimum age for admission shall be 17 years on 31st December of the year in which admission is sought. The maximum age limit for admission shall be 35 years.
2. Minimum Educational Qualification
a) Candidate with Science who have passed the qualifying 12th Standard examination (10+2) and must have obtained a minimum of 45% marks in Physics, Chemistry and Biology taken together.
The candidate must have pass marks in English.
b) Candidates are also eligible from State Open School recognized by State Government and National Institute of Open School (NIOS) recognized by Central Government having Science subjects and
English only.
c) English is a compulsory subject in 10+2 for being eligible for admission to B.Sc. (Nursing).
3. Colour blind candidates are eligible provided that colour corrective contact lens and spectacles are worn by such candidates.
4. Candidate shall be medically fit.
5. Married candidates are also eligible for admission.
6. Students shall be admitted once in a year.
7. Selection of candidates should be based on the merit of the entrance
examination. Entrance test** shall comprise of:
a) Aptitude for Nursing 20 marks
b) Physics 20 marks
c) Chemistry 20 marks
d) Biology 20 marks
e) English 20 marks
The minimum qualifying criteria of entrance test to admission to B.Sc.
Nursing is as under:
General 50th percentile
General – PwD 45th percentile
SC/ST/OBC 40th percentile
**Entrance test shall be conducted by University/State Government.
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B.Sc. (Post Basic)
Obtained a certificate in General Nursing and Midwifery and registered as R.N.R.M. with the State Nurses Registration Council. A male nurse, trained before the implementation of the new
integrated course besides being registered as a nurse with State Nurses Registration Council, shall produce evidence of training approved by Indian Nursing Council for a similar duration in lieu of midwifery in any one of the following areas:
O.T. Techniques
Ophthalmic Nursing
Leprosy Nursing
TB Nursing
Psychiatric Nursing
Neurological and Neuro surgical Nursing
Community Health Nursing
Cancer Nursing
Orthopedic Nursing
1. The candidate should be a Registered Nurse and Registered midwife or equivalent with any State Nursing Registration Council.
2. The Minimum education requirements shall be the passing of: B.Sc. Nursing/B.Sc. Hons. Nursing/Post Basic B.Sc. Nursing with minimum of 55% aggregate marks.
3. The candidate should have undergone in B.Sc. Nursing / B.Sc. Hons. Nursing / Post Basic B.Sc. Nursing.
4. Minimum one year of work experience after Basic B.Sc. Nursing.
5. Minimum one year of work experience prior or after Post Basic B.Sc. Nursing
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भारत में प्राचीन काल से ही किसी न किसी रूप में रूपयों का लेन देन होता था बौद्ध काल से ही कुछ ऐसी संस्थांए थी जो की व्यापारियों और विदेशों में जाने या घूमने के लिए उधार देते थे। प्राचीनकाल में कागज के नोट बिल या चेक आदि का प्रयोंग नही किया जाता था। बल्कि 12 वी शताब्दी से गाव में साहूकारों तथा बडे सेठों से रूपया को उधार लेने लगें। ये जो सेठ महाजन होते थे वह राजा महाराजाओं तथा मुगलो को भी आर्थि सहायता दिया करते थे। इन लोगों को जगत सेठ के नाम से जाने जाते थे।
भारत में सबसे पहले बैंक की स्थापना सन 1881 में की गई थी जिसका नाम अवध कॉमर्शियल बैंक था। उसके बाद फिर पंजाब नेशनल बैंक की स्थापना सन 1894 हुई थी। सन 1906 में स्वदेशी आंदोलन शुरू होने के कारण वाणिज्यक बैंकों की स्थापना को प्रोत्साहन मिला। वर्ष 1913 से 1917 के दौरान विभिन्न राज्यों में बैंकों का दिवालिया हो जाने से बैंकों का नियमन और उन पर नियंत्रण की आवश्यकता को बल मिल गया। इस कारण अधिनियम बैंकिंग कंपनी अधिनियमन सन 1949 में पारित किया गया और इसके बाद बैंकिंग कंपनी नियमन अधिनियम 1949 के रूप में जाना जाने लगा। इस नियम के जरिए बैंकिंग व्यवस्था पर कानूनी नियमन अधिकार रिजर्व बैंक को मिल गया।
सन 1955 में देश के सबसे बड़े बैंक इंपीरियल बैंक ऑफ इंडिया का राष्ट्रीयकरण किया गया इसका नाम बदलकर स्टेट बैंक ऑफ इंडिया कर दिया गया था और बाद में सन 1959 में किसके साथ सहयोगी बैंकों का गठन किया गया।
समाज के दायित्व को देखते हुए केंद्र सरकार ने आर्थिक विकास की मुख्यधारा लाने के उद्देश्य 14 प्रमुख बैंकों का नियंत्रण अपने हाथ में लेने लगा। 14 जुलाई 1969 को यह आदेश जारी किया। 15 अप्रैल सन 1980 को अन्य बैंकों का भी राष्ट्रीयकरण कर दिया गया।
आठवें दशक के अंत में कुछ ऐसी अनियमित व्यवस्था पाई गई जो सरकार को लगा कि इन्हें दूर किया जाना चाहिए ताकि वित्तीय व्यवस्था और अर्थव्यवस्था को बनाने में भूमिका निभा सके। तदनुसार वित्तीय ढांचे संगठन कामकाज और ऐसी सभी प्रक्रिया की जांच के लिए 14 अगस्त सन 1991 को श्री एम नरसिंहम की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया गया। यह समिति सिफारिशों के आधार पर सन 1993 में बैंकों में हो रहे गड़बड़ी को सुधार के लिए बनाई गई थी।
भुगतान संतुलन से अभिप्राय है कि देश के समस्त आया तो एवं निर्यात ओ के साथ अन्य सेवाओं के मूल्यों के संपूर्ण विवरण से है जो एक निश्चित समय के लिए बनाया जाता है भुगतान संतुलन में देश की विदेशी मुद्रा की लेन और देन का ब्यावरा शामिल किया जाता है।
प्रोफेसर हेबरलर के अनुसार
भुगतान संतुलन का अर्थ किसी भी हुई समय में विदेशी मुद्रा की खरीदी एवं बेची गई मात्रा से है।
प्रोफेसर बेनहम के अनुसार
किसी देश का भुगतान संतुलन उसका शेष विश्व के साथ एक समय में दी जाने वाली मौद्रिक लेनदेन का विवरण होता है जबकि एक देश का व्यापार संतुलन एक निश्चित समय में इसके आयात एवं निर्यात के बीच संबंधों को दर्शाता है।
सामान्यतः भुगतान संतुलन बराबर रहता है किंतु जब चालू खाते की बाकी व पूंजीगत सौदे की शुद्ध राशियों की बाकी को जोड़कर जो राशि आती है वह भुगतान संतुलन के बचत तथा घाटे को दर्शाती है जब कोई प्राप्तियां कम एवं कुल भुगतान अधिक होता है तो भुगतान संतुलन में घाटा होता है और इसके उल्टा यदि प्राप्तियां अधिक होती हैं तो और भुगतान कम करना पड़ता है तो बचत या अतिरेक कहते हैं।
1. चालू खाता
2. पूंजी खाता
3. एकतरफा हस्तांतरण खाते
4. आधिकारिक आरक्षित खाते

1. खाद्यान्नों का आयात
देश के अंदर किसी प्रकार का प्राकृतिक प्रकोप आ जाने से खाद्यान्नों का बड़े पैमाने में आयात करना पड़ता है जो कि देश के भुगतान संतुलन की प्रतिकूलता का प्रमुख कारण है।
2. भारी मशीनों का आयात
औद्योगिकीकरण को बढ़ाने के लिए बड़ी मशीनों का आयात किया जाता है तकनीकी ज्ञान का भी आयात किया जाता है।
3. स्पीति प्रभाव
विभिन्न योजनाओं में सरकार द्वारा बड़ी मात्रा में धनराशी का खर्च किया जाता है जिससे मुद्रास्फीति में लगातार बढ़ोतरी हुई है इस प्रभाव के कारण विदेशियों को भारत का बाजार बहुत अच्छा मिला जिस से आयात बड़ा और भुगतान संतुलन प्रतिकूल हो गया।
4. निम्न निर्यात
भारत देश के अंदर आयातो से उसके निर्यातो की तुलना नहीं की जा सकती है। अपने देश के अन्दर ऐसी वस्तुओ का निर्माण किया जाता है जिनकी लागत अधिक होती है और उस तरह से वस्तुओ का निर्माण अच्छी गुणवत्ता वाली नही हो पाती है या कह सकते है की खराब होती है । जिससे विश्व बाजार में उनकी मॉग कम होती है ।
5. सुरक्षा पर खर्च
भारत में चीन एवं पाकिस्तान से युुद्ध के भय के कारण देश में भारी सुरक्षा के लिए अधिक धन खर्च की जाती है । और सुरक्षा से संबंधिक तकनीकी मशीनों का आयात किया जाता है ।
6. जनसंख्या
भारत में जनसंख्या दिन प्रतिदिन बढ्ती जा रही है जिससे आयातों मे वृृद्धि होती जाती है । तथा घरेलू अपभाेग बढ्ने के कारण निर्यात की क्षमता में कमी आयी है।
मॉंंग से आप क्या समझते है,
मॉंग को प्रभावित करने वाले तत्व लिखिए,
मॉंग की परिभाषा, मॉंग के नियम लिखिए,
माँँग के नियम की विशेेषता, मॉंग के नियम की मान्यता लिखिए,
माँँग के नियम लागू होने के कारण बताइए,
मॉंग के नियम के अपवाद लिखिए
मांग का अर्थ एवं परिभाषा / mang ka arth likhiye
माॅग से अभिप्राय है कि एक दी हुई वस्तु की उन विभिन्न मात्राओं से हैं जिन्हें उपभोक्ता एक बाजार में किसी दिए हुए समय में विभिन्न मूल्यों पर खरीद करते हैं वस्तु के लिए केवल इच्छा का होना ही वस्तु की मांग नहीं कहलाते बल्कि इच्छा की पूर्ति के लिए व्यक्तियों के पास साधन भी होने चाहिए तभी वह माग कहलाएगी।
अर्थशास्त्र में मांग की परिभाषा क्या है?/ mang ki paribhasha
mang ki paribhasha in hindi
प्रोफ़ेसर मिल के अनुसार
मांग से हमारा आशय किसी वस्तु की उस मात्रा से होता है जो एक निश्चित मूल्य पर खरीदी जाती है इसका अर्थ मांग सदा मूल्य से संबंधित होता है।
प्रोफ़ेसर पेंशन के अनुसार
मॉग में निम्नलिखित तीन बाते शामिल होती है
1 किसी वस्तु को प्राप्त करने की इच्छा
2. उसे क्रय करने के साधन और
3. इन साधनों से वस्तु प्राप्त करने की तत्परता।
प्राफेसर बेनहम के अनुसार
किसी दिये हुए मूल्य पर वस्तु की मॉग उस मात्रा को कहते है जो उस मूल्य पर एक निश्चित समय में क्रय की जाती है ।
मॉंंग को प्रभावित करने वाले तत्व लिखिए /mang ke tatv
1. वस्तु की कीमत - किसी वस्तु की मॉग को प्रभावित करने का महत्वपूर्ण तत्व उसकी कीमत होती है । अगर वस्तु की कीमत में परिवर्तन होने पर उसकी मॉग में भी परिवर्तन हो जाता है । अधिक्तर वस्तु की कीमत घटने पर वस्तु की मॉग बढ जाती है । ठीक इसी के उल्टा होता है अगर वस्तु की कीमत बढती है तो उसकी मॉंग घट जाती है ।
2. उपभोक्ता की आय - वस्तु की उपभोग करने वाले व्यक्ति की आय भी किसी वस्तु की मॉंग को निर्धारित करने वाला महत्वपूर्ण निर्धारक तत्व है । उदाहरण के लिए अगर किसी व्यक्ति की आय बढ जाने पर वह किसी वस्तु की अधिक मात्रा में ऊचे मूल्य पर क्रय करेगा। अगर आय कम होने पर वस्तु को क्रय करने की मूल्य में कम मात्रा में क्रय करेगा।
3. धन की वितरण - यदि समाज में मूल्य का वितरण असमान है तो ऐसी वस्तुओं की मॉग अधिक होगी जो पूजीपतियो द्वारा वस्तुओं को खरीदी की जाती है । यदि व्यक्तियों के आय समान है तो व्यक्तियों के आय में कम अन्तर आयेगा वस्तु की मॉंग बढेगी।
4. जनसंख्या में परिवर्तन - जनसंख्या बढने पर वस्तुओं की मूल्य अधिक होने पर भी वस्तु की मॉग बढती है । अगर कम जनसंख्या होगी तो वस्तुओ की मॉग कम होगी ।
5. ऋतु में परिवर्तन -ऋतु परिवर्त में भी मॉग का प्रभाव पडता है जैसे ठंडी के ऋतु में बर्फ का मूल्य कम हाे जाता है और उसकी कोई मॉग भी नही करता है इसके विपरीत अगर गर्मी का ऋतु हो तो बर्फ का मूल्य बढ जाता है ।
अर्थशास्त्र में मांग का नियम क्या है?/ मांग के नियमों से क्या अभिप्राय है?/ mang ke niyam
मॉंग का नियम - किसी वस्तु का मूल्य तथा उस वस्तु की मागी गई मूल्य की मात्रा के परस्पर संबंध को माँँग का नियम कहा जाता है । माँँग का नियम यह सिद्ध करता है कि किसी वस्तु का मूल्य बढने पर उसकी मॉंग में कमी तथा मूल्य घटने पर मॉग में बढने लगती है ।
मांग के नियम की विशेषताएं/ mang ke niyam ki visheshtayen bataiye
1. कीमत एवं मॉंग में विपरीत संबंध होते है
2. कीमत स्वतंत्र होती है और मॉग आश्रित होता है
3. मॉंग का नियम एक गुणात्मक कथन है ।
4. मॉग का नियम किसी निश्चित समय पर वस्तु अथवा सेवा की कीमत और मॉंग में विपरीत संबंध को स्पष्ट करती है ।
मांग के नियम की व्याख्या कीजिए/ mang ke niyam ki vyakhya
1) किसी वस्तु की उपभोग करते समय में व्यक्ति की आय में परिवर्तन नही होना चाहिए क्योंकि ऐसी स्थिति में उसके खर्च करने की शक्ति में परिवर्तन हो जाता है ।
2) यदि वस्तु के प्रतिस्थानापन्न सम्भव हो तो उस वस्तु के मूल्य में किसी भी तरह का परिवर्तन नहीं होना चाहिए क्योंकि यह नियम ठीक प्रकार से लागू नहीं होता है ।
3) उपभोग करने वाले व्यक्ति की वस्तु को प्राप्त करने की तीव्रता समान रहनी चाहिए । यदि इसमें किसी प्रकार का परिवर्तन होता है तो माग का नियम ठीक प्रकार से लागू नही होता है ।
4) उपभोग करते समय उपभोक्ता की इच्छा में कोई परिवर्तन नही होना चाहिए ।
5) वस्तु की पूर्ति करते समय वस्तु के आकार या गुण में कोई परिवर्तन नही होना चाहिए ।
मांग का नियम क्या है इसकी मान्यताओं और अपवादों की व्याख्या करें?/ mang ke niyam ki manyata
1) सीमान्त उपयोगिता हास्य नियम - यह नियम यह बताता है कि जैसे- जैसे एक वस्तु की अधिक इकाइयों का उपयोग किया जाता है वैसे-वैसे उससे प्राप्त होने वाली सीमान्त उपयोगिता कम होती जाती है क्योंकि उपभोक्ता वस्तु के लिए सीमान्त उपयोगिता के बराबर मूल्य नही देने को तैयार रहता है यदि वस्तु की मूल्य में कमी हाती है तो उपभोक्ता वस्तु की अधिक इकाई का उपभोग करता है । अत- मॉग का नियम सीमान्त उपयोगिता के हास्य नियम पर आधारित है ।
2) प्रतिस्थानापन्न वस्तुओ का प्रभाव - जब किसी वस्तु की मूल्य बढती है तो इसकी स्थानापन्न वस्तु की सामने मूल्य स्वम् हि कम हो जाती है । जैसे कि वस्तु की कीमत वृद्धि होने पर इसकी स्थानापन्न वस्तु अपेक्षाकृत सस्ती हो जाती है ।
काॅफी की मूल्य में अधिक होने पर लोग चाय की अधिक मॉग करते है ।
3) आय प्रभाव - आय प्रभाव यह बताता है कि किसी वस्तु के मूल्य में कमी होने से उभोक्ता की आय या क्रय-शक्ति में वृद्धि होती है। और वह मुद्रा की उतनी ही मात्रा में अधिक से अधिक वस्तु खरीद सकता है ।
4) क्रेताओं की संख्या में परिवर्तन - जब वस्तु की मूल्य कम हो जाती है तो कुछ उपभोक्ता भी इसकी वस्तु कुछ मात्रा खरीद लेते है । समाज में भिन्न भिन्न क्रय शक्ति वाले उपभोक्ता होते है ।
1) भविष्य में किसी वस्तु के दुर्लभ होने की सम्भावना - यदि किसी वस्तु के कीमत में वृद्धि के साथ - साथ भविष्य में उस वस्तु की मूल्य में बढने से लोग उस वस्तु को संग्रह करने लगते है ।
2) आवश्यक वस्तुओं के सम्बन्ध में यह नियम क्रियाशीलता नही होता - हम पहले कह चुके है कि मॉग का नियम हास्यसमान तुष्टिगुण नियम पर आधारित है। हास्य समान तुष्टिगुण नियम केवल सुखम अर्थव्यवस्था में ही लागू होता है ।
3) प्रतिष्ठा प्रदान करने वाली अथवा मूल्यवान वस्तुओं पर मॉंग नियम लागू नहीं होता - अपनी मान को बढाने के लिए लोग अथवा कीमती वस्तु का प्रयोग धनी लोग समाज में सम्मान पाने अथवा अपनी सम्पन्नता का प्रदर्शन करने को दिखाते है । अत- ऐसी वस्तुओं का मॉग बढ जाने पर इस तरह की वस्तु का मूल्य और मॉंग अधिक बढ जाते है ।
4) उपभोक्ता की अज्ञानता - कभी - कभी उपभोक्ता अज्ञानता उचे मूल्य पर वस्तुआकें की अधिक मॉंग बढ जाती है ।। इनकी मॉंग घट जाने में इसकी मॉंग कम कर देते है।
5) गिफिन का विरोधाभास - सर रॉबर्ट गिफिन ने बताया कि निम्नकोटि की वस्तुओं के संबंध में मॉग का नियम लागू होते है ।
प्रोफेसर केयरनक्रास के अनुसार - किसी वस्तु की मॉंग की लोच वह दर है जिस पर खरीदी जाने वाली मात्रा की कीमत परिवर्तनों के परिणामस्वरूप में बदलती है ।
1)मूल्य के निर्धारण करने में महत्व - मॉंग की लोच अधिक होने पर वस्तु की मूल्य को नीचे रखा जाता है अगर वस्तु की मूल्य को उचा रखने पर वस्तु की मॉग बढ जाती है और ठीक इसके उल्टा बेलोचदार वस्तुओ को मूल्य उचा रखा जाता है । जैसे पूर्ण प्रतियोगिता, एकाधिकार, एकाधिकृृत प्रतियोगिता आदि में वस्तु की मूल्य निर्धारण करने में सहायता प्रदान करती है /
2) वितरण के सिद्धांत में महत्व - मॉंग की लोच का विचार उत्पादन के विभिन्न साधनों का पुरस्कार निर्धारित करने में सहायक होता है जैसे कि उत्पादन कर्ता उन साधनों को अधिक पुरस्कार देता है जो साधन अधिक बेलोच होते है तथा उन साधनो को कम पुरस्कार देता है जिनकी मॉग उनके लिए लोचदार होती हैै।
3) सरकार के महत्व - ऐसी वस्तुओ की मॉंग की लोच बेलोचदार होती है तो उन वस्तुओं पर कर की दर उची रखी जाती है क्योंकि उची दर लगाने पर भी वस्तु की मॉंग में कोई परिवर्तन नहीं होता है और उसी मॉग पूर्व तरीके से रहती है । ठीक इसके उल्टा कर दे जिन वस्तुओ की मॉंग की लोच अधिक लोचदार होती है उन वस्तुओं पर कर की दर कम रखी जाती है क्योंकि ऐसी वस्तुओ की मॉंग में परिवर्तन होने लगता है । इसलिए कर निर्धारण में मॉंग की लोच की धारणा सरकार के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण होती है ।
अंतरराष्ट्रीय व्यापार में महत्व - अंतरराष्ट्रीय व्यापार के अंतर्गत देश में व्यापार का लाभ उस देश की व्यापार की शर्तों को निर्धारित करता है और व्यापार के साथ दोनों देशों में आयात और निर्यात की मांग एवं पूर्ति की लोच पर निर्भर करती है उदाहरण यदि किसी देश की निर्यात वस्तुओं की मां ब्लाउज दार है तो उस वस्तु की कीमतों को ऊंची दामों में बेच सकेगा इसी प्रकार आयात के वस्तुओं में यदि उस वस्तु की मांग रोजदार है तो उस वस्तु की कीमत ऊंची दर पर देना पड़ेगा।
यातायात में उद्योग में महत्व - यातायात उद्योग में भाड़े की दरें निर्धारित करने में मां किलोज में सहायक होता है जिन वस्तुओं की यातायात में माग बेलोचदार होती है तो ऐसे भाड़ों की दर ऊंची रखी जाती है तथा जिनकी मां लोचदार होती है उनकी दरें नीचे रखी जाती है।
1) वस्तु की प्रकृति - किसी वस्तु की माग की लोच बहुत कुछ उसकी प्रकृति पर निर्भर करती है कुछ ऐसी अनिवार्य वस्तु है जिनकी मांग की लोच बेलोचदार होती है क्योंकि उन वस्तु को क्रय करना उपभोक्ता के लिए अनिवार्य होता है विलासिता की वस्तुओं की मांग अत्यधिक लोचदार व आरामदायक वस्तुओं की मांग साधारण लोचदार होती है।
वस्तुओं के क्रेता का वर्ग - वस्तुओं की मांग क्रेता के वर्ग पर भी निर्भर रहती है यदि कोई ऐसी वस्तु है जिन का उपभोग केवल धनी व्यक्ति ही कर सकते हैं तो उन वस्तुओं की मांग लाेच बेलोच होगी तो वस्तुओं के मूल्य में परिवर्तन होने पर भी विशेष प्रभाव नहीं पड़ता है यदि किसी निम्न वर्ग का उपभोग करता है तो उन वस्तुओं की मांग की लोच अधिक लोचदार होगी तो कीमत में परिवर्तन होने पर उनकी माग में बहुत अधिक परिवर्तन हो जाता है।
स्थानापन्न वस्तुओं की मां लोचदार होती है - ऐसी वस्तुएं जिनकी मौत उनके स्थान पर अपेक्षाकृत सस्ती वस्तुओं का उपयोग किया जा सकता है तो अधिक लोचदार होती हैं। जैसे एक ही मूल्य पर बहुत सारे कपड़े धोने के साबुन मिल जाते हैं लेकिन किसी एक साबुन का मूल्य अधिक हो जाने पर उसके स्थान पर दूसरी साबुन का उपयोग करने लगते हैं जिससे पहले उपयोग करने वाले साबुन की मांग घट जाती है।
वस्तुओं का मूल्य - मांग कि लोच वस्तु के मूल्य पर निर्भर करती है ऐसी वस्तुएं जिनका मूल्य अधिक होता है उनकी माग कम लोचदार होती है और जिन वस्तुओं की कीमत कम होती है उन वस्तुओं की मांग कम लोचदार या बेलोचदार होते हैं। जिन वस्तुओं का मूल्य ना अधिक हो ना बहुत कम है उनकी मांग प्राय: लोचदार होती है।
समाज में धन के वितरण का स्वरूप - जब समाज में धन का वितरण सामान होता है तो सभी व्यक्तियों की खरीदने की शक्ति समान रहती है अतः मूल परिवर्तन होने पर भी वस्तु की मांग पर कोई परिवर्तन नहीं होता है ऐसी अवस्था में कुछ व्यक्ति अधिक खरीदते हैं और कुछ कम अतः मूल्य का परिवर्तन से कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।
वस्तु की वह मात्रा जिसे उत्पादन कर्ता एवं उस उत्पादन वस्तु की विक्रेता दोनों के बीच एक निश्चित मूल्य पर बेचने के तत्यपर से है । दूसरे शब्दों में किसी वस्तु की पूर्ति से आशय उस मात्रा से से है जो किसी समय में कीमत विशेष की पर बाजार में वस्तु उपलब्ध होती है ।
प्रो. बेन्हम के अनुसार - पूर्ति का आशय वस्तु की उस निश्चित मात्रा से है जिसे प्रति इकाई के मूल्य पर किसी निश्चित अबधि में बेचने के लिए विक्रेता द्वारा प्रस्ततु किया जाता है।
यदि किसी अवधि बिन्दू पर पर्ति की तकनीक दशाओं के अलावा अन्य बाते सामान्य रहे तो वस्तु विशेष की मूल्य में परिवर्तन होने पर उसकी पूर्ति में भी परिवर्तन होते है अत- कीमत और पूर्ति में प्रत्यक्ष रूप संबंध होते है । वस्तु की मूल्य में वृद्धि होने पर उस वस्तु की पूर्ति बढ जाती हे और उस वस्तु की मूल्य में कमी आने पर उस वस्तु की पूर्ति घट जाती है । वस्तु के प्रति जो मूल्य में परिवर्तन के साथ -साथ उसकी ही दिशा में में वस्तुुकी पर्ति के घटने बढने की प्रवृत्ति को पूर्ति का नियम कहते है ।
1. बाजार पूर्ति - बाजार पूर्ति को अल्प कालीन पूर्ति कहते है इस प्रकार के बाजार में पर्ति में कोई परिवर्तन नहीं होते है । बाजार में पूर्ति कुछ घटें या फिर एक दिन के लिए संबंध होता है ।
2) अल्पकालीन पूर्ति - बाजार पूर्ति की अपेक्षा कम समय में पूर्ति में वस्तु के विक्रेता के पास ज्यादा समय रहता है । इसी अधिक समय के कारण विक्रेता वस्तु की पूर्ति में मॉंग के अनुसार थोडी बहुत कमी या वृद्धि कर सकता है। परन्तु विक्रेता के पास इतना समय नहीं होता कि वह पूर्णतया वस्तु की पूर्ति के अनुरूप वस्तु की मूल्य में परिवर्तन कर सके ।
3) दीर्घकालीन पूर्ति - जैसा कि नाम से ही पता चलता है कि इसमें विक्रता के पास समय का अभाव नहीं पाया जात है । इसमें समय पर्याप्त मात्रा में होने के कारण विक्रेता अपनी वस्तु को वस्तु की पूर्ति मॉंग के अनुसार बढा और घटा सकता है । यदि इसमें उत्पत्ति वृद्धि का नियम लागू होता है तो पूर्ति वक्र Åपर से नीचे की ओर होगा । और इसमें उत्पत्ति हास नियम की दशा में ये नीचे से Åपर को दायी ओर जाने वाल बनेगा।
4) सामूहिक पर्ति - जब वस्तु विशेष की पूर्ति विभिन्न माध्यमों के द्वारा की जाती है तो उसे सामूहिक पूर्ति कहते है । जैसे शक्ति सामूहिक पर्ति का उदाहरण है क्योकि शक्ति आपूर्ति विद्युत से, कोयला, जल, पवन आदि से किया जा सकता है ।
5) संयुक्त पूर्ति - जब किसी वस्तु की पूर्ति को दो या दो से अधिक वस्तुए प्राप्त होती है तो उसे संयुक्त पूर्ति कहते है।
1) वस्तु विशेष की कीमत - वस्तु में अन्य बाते सामान्य रहे अधिक मूल्य पर वस्तु की मूल्य में विक्रेता को अधिक लाभ प्राप्त होता है तो इसलिए विक्रता उस वस्तु की मूल्य अधिक कर के बेचेगा । दूसरे शब्दों में वस्तु विशेष की मूल्य अधिक होने पर उसकी पर्ति अधिक होगी ।
2)अन्य वस्तुओं की कीमतें
अन्य वस्तुओं की कीमतें वस्तु विशेष की डिक्री ने लाभ की मात्रा को प्रभावित करते है। जैसे terikaut और रेशमी वस्त्रों की मूल्य बढ़ जाती है जबकि सूती वस्त्र की कीमत में कोई परिवर्तन नहीं होता है इस स्थिति में सूती वस्त्र की अपेक्षा कम लाभ प्राप्त होता है जिससे उसकी पूर्ति कम हो जाएगी।
3)उत्पादन के साधनों की कीमतें
यदि किसी वस्तु की उत्पादन में साधनों की कीमतें बढ़ जाती है तो उस वस्तु की उत्पादन लागत बढ़ जाएगी और उससे कुर्ती में कमी हो जाएगी यदी इसके विपरीत होता है कि उत्पादन के साधनों की मूल्य कम होती है तो वस्तु की लागत में कम होगी और उस वस्तु पूर्ति बढ़ेगी।
4)सरकार की कर नीति
सरकार के कर नीति के कारण से भी वस्तु के मूल्य में प्रभाव पड़ता है यदि सरकार किसी वस्तु पर अधिक कर लगाती है तो वह वस्तु महंगी पड़ेगी और उसकी पूर्ति कम होगी।
5)तकनीकी ज्ञान
वर्तमान समय में तकनीकी ज्ञान से विभिन्न प्रकार की वस्तुओं की पूर्ति में निरंतर वृद्धि हो रही है तकनीकी सुधार में कम खर्चा लगता है और उत्पादन कर्ता का लाभ बढ़ जाता है इस कारण से वस्तुओ की पूर्ति में वृद्धि करते रहते हैं।
6उत्पादनकर्ता में परस्पर समझौता
कभी-कभी किसी निश्चित उद्देश्य की पूर्ति के लिए सभी उत्पादक मिलकर समझौता कर लेते हैं तब वस्तु की पूर्ति में कमियां वृद्धि हो सकती है।
7)परिवहन व संचार के साधन
यदि परिवहन व संचार के साधन विकसित है तो वस्तु की पूर्ति को नियंत्रित एवं पर्याप्त बनाए रखने में हमारी सहायता प्रदान करते हैं यदि किसी वस्तु की पूर्ति क्षेत्र में आवश्यकता से अधिक है और दूसरे क्षेत्र में आवश्यकता से कम है तो इन साधनों द्वारा संतुलित किया जा सकता है।
8)प्राकृतिक घटक
कुछ वस्तुओं का उत्पादन प्राकृतिक घाटको पर निर्भर करता है यदि प्राकृतिक घटक पक्ष में है तो वस्तु की पूर्ति बढ़ जाती है अन्यथा नहीं । जैसे कृषि क्षेत्र में यदि वर्षा पर्याप्त हो जाती है तो वस्तुओं की पूर्ति बढ़ जाती है। अगर वर्षा नहीं होती है तो वस्तुओं की पूर्ति घट जाती है।
1.भविष्य में कीमत परिवर्तन के आशा
पूर्ति का नियम उस समय में लागू नहीं हो पाता जहां आशा हो की वस्तु की कीमत भविष्य में अभी और परिवर्तन होंगे।
यदि किसी वस्तु की कीमत बढ़ जाए तथा यह आशा हो कि भविष्य में इसकी कीमत और बढ़ेगी तो उस वस्तु को पूर्ति बढ़ने के स्थान पर घट जाएगी क्योंकि उत्पादन करता और विक्रेता इसका अधिक स्टॉक रखना पसंद करेंगे।
कृषि उत्पादन संबंधी वस्तुओं पर लागू नहीं होता
कृष वस्तुओं के उत्पादन पर भी यह नियम लागू नहीं होता है क्योंकि प्राकृतिक पर अधिक निर्भर है अतः मूल्य में बढ़े होने पर भी कृषि क्षेत्र में उत्पादन बढ़ाना आवश्यक नहीं होता।
नीलामी की वस्तुओं पर लागू ना होना
यह नियम नीलामी की वस्तुओं पर लागू नहीं होता है क्योंकि ऐसी वस्तुएं की पूर्ति हमेशा सीमित रहती है और इससे ना तो घटाया जा सकता है और ना ही बढ़ाया जा सकता है।
श्रेष्ठ कलात्मक वस्तुओं पर भी यह नियम लागू नहीं होता
ऐसी वस्तुएं जिनकी कीमत बढ़ने पर भी उनकी पूर्ति नहीं पढ़ाया जा सकता है उन वस्तुओं पर यह नियम लागू नहीं होता है।
अल्पविकसित तथा पिछड़े देशों में श्रम की पूर्ति पर लागू नहीं होता है
पूर्ति का नियम रोजगार के क्षेत्र की पूर्ति पर लागू नहीं होता है विशेषकर अल्पविकसित देशों में श्रम की पूर्ति इस नियमानुसार नहीं होती है।
1.क्रेता और विक्रेता की आय में कोई परिवर्तन नहीं होना चाहिए
2.वस्तु के क्रेता एवं विक्रेताओं की आदत स्वभाव एवं रुचि में कोई परिवर्तन नहीं होना चाहिए
3.वस्तु की उत्पादन के साधनों की मूल्य सामान्य मान ली जाती हैं
4.उत्पादन की तकनीक में कोई परिवर्तन नहीं होना चाहिए
5..वस्तु की कीमत में थोड़ा परिवर्तन होने के हर स्वरूप पूर्व में भी परिवर्तन होना चाहिए।
purti ka niyam kya hai
purti kise kahate hain
purti ke niyam ki vyakhya kijiye
purti ki manyata
